रविवार, 8 नवंबर 2009

नया बिहार तलाश रहे थे प्रभाष जोशी

पटना : अभी इसी माह की पहली तारीख को श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल के सभागार में लोगों की खचाखच भीड़ के बीच, हिन्दी पत्रकारिता के स्तम्भ प्रभाष जोशी. बिहार को नयी राजनीति का चेहरा दिखा रहे थे. यही उनकी आखिरी बाहरी यात्रा भी रही. वो मुसलमानों को नयी राजनीति शुरू करने की सलाह दे रहे थे. उनकी इस राय पर बिहार के कोने-कोने से जमा भीड़ ने तालियों की गडग़ड़ाहट के साथ उनके विचार प्रवाह को समर्थन दिया था. तब वे आत्मविश्वास से भर गये थे, और देश की 62 साल की राजनीति पर अपने तजुर्बे के आधार पर रौशनी डाली थी. पर 5 नवम्बर की रात उनकी अचानक मौत की खबर ने, बिहार के उन लोगों को स्तब्ध कर दिया जो, उनके इस तर्क से सहमत दिख रहे थे, कि देश की राजनीति को बदलने की जरूरत है. तब जोशी जी भी नहीं जानते थे कि, 1 नवम्बर की उनकी बिहार यात्रा अंतिम यात्रा होगी क्योंकि वे, यहां से लौटने के चार दिनों के बाद ही इस दुनिया से कूच कर जायेंगे.
जोशी जी, गत 1 नवम्बर को, जसवंत सिंह की जिन्ना और भारत पाक बंटवारा पर, लिखी पुस्तक के उर्दू संस्करण का विमोचन करने, श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल पहुंचे थे. मंच पर उनके पहुंचते ही पत्रकार दीर्घा में बैठे, पत्रकारों एवं स्तम्भकारों ने उनका हाथ उठाकर अभिवादन किया था. उन्होंने अपने अनुज पत्रकार बन्धुओं के अभिवादन को स्वीकार किया. हाथ उठा उठाकर वे उनके आदाब सलाम का जवाब देते, आत्मविश्वास से लबरेज थे. जोशी जी का बिहार से काफी लगाव रहा. वे बिहारी पत्रकारों के बुलावे पर अपनी व्यस्तता के रहते भी समय निकाल यहां दौड़े चले आते थे.
1 नवम्बर को राज्यसभा सदस्य व संगम उर्दू दैनिक के चीफ एडीटर डॉ. एजाज अली के बुलावे पर वे पटना पहुंचे थे. उन्होंने जसवंत सिंह की पुस्तक विमोचन के उपरांत, उपस्थित जन समूह को सम्बोधित करते हुए कहा था कि मुसलमान, युवाओं व बुजूर्गों की इतनी बड़ी भीड़ इस हाल में सिर्फ पुस्तक विमोचन के लिए जमा नहीं हुई है, बल्कि राज्य के मुसलमान नयी राजनीति शुरू करना चाहते हैं. उन्होंने कहा था कि, देश के मुसलमानों को सीना ठोंक कर राजनीति करनी चाहिए और अपनी राजनीति शुरू करनी चाहिए. उनके साथ जायें जो उनकी समस्याओं का निदान निकाले और उनके हक व हकूक को अमली जामा पहनाये. सच्चर आयोग की रिर्पोट ने यह साफ कर दिया है कि मुसलमान आज कहां है. इसलिए न लालू की सुनें और न ही नीतीश की. जसवंत के नेतृत्व मेें नयी राजनीति शुरू करें, यही वक्त की मांग है. उनके अभिभाषण का एक-एक शब्द उपस्थित जनसमूह, पूरी खामोशी के साथ न सिर्फ सुन रहा था बल्कि, कलम के उस मजबूत सिपाही के मार्ग दर्शन पर तालियां बजाकर मुहर भी लगा रहा था.
5 नवंबर को उनकी मौत, भारत आस्ट्रेलिया के बीच हुए वनडे मैच में सचिन की बेहतरीन पारी के बाद भी, भारत की हार के बाद दिल का दौरा पडऩे के कारण हुई. जैसा सभी जानते हैं, वे क्रिकेट शौक से देखते थे. और सचिन और गावस्कर उनके चहेतों में से थे. 5 नवम्बर को भारत आस्ट्रेलिया वनडे मैच में सचिन ने जिस जांबाजी के साथ खेल का प्रदर्शन किया 175 रन बनाये फिर भी भारत 3 रनों से हार गया. इस शॉक को शायद जोशी जी झेल नहीं पाये और उन्हें दिल का दौरा पड़ा आनन फानन में घर के लोग उन्हें अस्पताल ले गये, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. बहुत लोग शायद नहीं जानते होंगे कि जोशी जी, 18 नवम्बर को भी पटना के पत्रकार श्रीकांत जी की पुत्री की शादी में भाग लेने के लिए आनेवाले थे. पर ऐसा हो न सका और 1 नवम्बर उनकी अंतिम बिहार यात्रा बन कर रह गयी.

शनिवार, 7 नवंबर 2009

2010 के मार्च तक बिहार में पानी व अनाज का पड़ जायेगा टोटा

पटना : आपदा प्रबंधन विभाग बिहार सरकार के विशेष सचिव डॉ. सत्येन्द्र कुमार ने कहा कि आपका प्रवन्धन में कम्युनिकेशन का अहम रोल है पर मैसेज लोगों को उनकी भाषा मेें मिले जिसे वे आसानी से ग्रहण कर लें तभी यह लाभकारी होगा अभी ऐसा नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा कि मार्च 2010 तक राज्य के लोगों की अनाज व पीने के पानी की समस्या से दो चार होना पड़ेगा इसके लिए सरकार ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर कार्य योजना तैयार की है समारोह के मुख्य अतिथि विधानसभा के सभापति उदय नारायण चौधरी ने कहा कि मोबाईल कंपनियों को दुर दराज के देहातों तक अपनी सेवा पहुंचानी होगी तभी हम आपदा के समय उन्हें राहत पहुंचाने में सक्षम होंगे.
एयरटेल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बिहार शिशिर कुमार ने कहा कि बिहार में भारती पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के सिद्घांत पर कार्य करने के लिए पूरी तरह तैयार है. मोबाइल के माध्यम से आपदा के समय पर, हम जनजीवन की सुरक्षा में भरपुर सहयोग कर सकते हैं. साथ ही हम उन्नत खेती के तरीकों से किसानों को प्रशिक्षित करने के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी दायित्व निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं इसके लिए 2010 तक बिहार में 500 सत्य भारती स्कूल खोले जाएंगें तथा वैसे स्कूलों को भारती, गोद लेगा और उसे पूरा सहयोग प्रदान क रेंगे. उन स्कूलों के बच्चों को शिक्षा के साथ वोकेशनल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा तथा वोकेशनल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा तथा स्कूलों के रख-रखाव का पूरा खर्च एयरटेल भुगतान करेगा. उन्होंने आगे कहा कि सत्य भारती सिविल सेकेंडरी सह वोकेशनल प्रशिक्षण स्कूल खोले जाएंगे जिसमें छात्रों को मोबाइल रिपेयेरिंग के साथ-साथ इन्टरनेट की जानकारी प्रदान की जाएगी. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार देश की आबादी तेजी से बढ़ रही है वैसी हालत में हम युवाओं को जीविकोपार्जन के लिए नयी तकनीक से रूबरू नहीं करा पाये तो, आने वाले समय म ें हम देश का कल्याण नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि अच्छे विजनेस लीडर के पहले अच्छा इंसान बनना पड़ेगा. वे यहां पटना के होटल अशोक में आपदा व सूचना टेक्नॉलोजी और कम्युनिकेशन पर अपना विचार व्यक्त कर रहे थे. उन्होंने कोसी क्षेत्र में बाढ़ की विभिषिका के समय एयरटेल की ओर से पहुंचाने गये राहत की भी चर्चा की और कहा कि उनका संस्थान स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करने के इच्छुक हैं. इस अवसर पर संजय पाण्डेय, अनुराग प्रसाद, सीआर एस के फादर मांजेकर ने भी अपना विचार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन सीआरएम के नीतीश कुमार कर रहे थे.

देश विभाजन के सच को उजागर करते रहेंगे डा.एजाज

पटना: जसवंत सिंह की जिन्ना पर लिखी पुस्तक के विमोचन के बहाने पटना में सफल कार्यक्रम आयोजित कर सांसद डा.एजाज अली ने यह साबित कर दिया है कि बंटवारे का दुख आज भी भारतीय मुसलमानों को है और वे फिर से एक साथ रहना चाहते हैं.साथ ही इस सम्मेलन ने इस बहस को आगे भी जारी रखने का रास्ता खोल दिया है कि देश के विभाजन का असल जिम्मेदार कौन है? जसवंत सिंह की किताब ने बंटवारे के लिए जिन्ना,नेहरू और पटेल को समान रूप से दोषी ठहरा कर इस बात का खुलासा किया है कि बंटवारे के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराने की बजाये उस समय के लीडरों पर इसकी जिम्मेदारी थोपी जाए तो ज्यादा बेहतर होगा. डा. एजाज इस मिशन को आगे भी जारी रखना चाहते हैं. उनका मानना है कि भाजपा व कांग्रेस दोनों पार्टियों देश के विभाजन के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराती रही हैं और इसका प्रचार भी कराती रही हैं. असल में भाजपा और कांग्रेस का इस इश्यू पर परस्पर सांठगांठ है क्योंकि मुसलमाना को भाजपा का डर दिखा कर कांग्रेस वोट प्राप्त करती रही हैं जबकि मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ भाजपा हिन्दुओं का वोट प्राप्त करती रही हैं. जसवंत ने इस बात का खुलासा किया है कि किस प्रकार कुर्सी की चाह में जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल ने पाकिस्तान के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी जबकि महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया था.
एक नवम्बर को लोगों से खचाखच भड़े पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में वक्ताओं ने राज्य के कोने कोने से आये अवाम को बंटवारे के सच से रूबरू कराया. उपस्थित भीड़ बार बार तालियां बजाकर वक्ताओं की हौसला अफ्जाई करते रहे. सम्मेलन की सफलता ने डा.एजाज अली की राजनीतिक हैसियत को नयी उंचाई दी है साथ ही आम मुसलमानों के नेता के रूप में भी स्थापित किया है. सम्मेलन में उमड़ी भीड़ डा.एजाज के जनाधार और लोगों पर उनकी पकड़ को साफ तौर पर दर्शा रहा था. बिहार में सम्मेलन की सफलता के बाद वे अब बंगाल में इसी विषय पर सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी में जुट गये हैं.उनकी मुहिम सोशलिस्ट-कम्युनिष्टï विचारधारा को एकजुट कर देश में नयी राजनीति शुरु करने की है ताकि देश के मानचित्र से देश को विखंडित करनेवाली भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां सत्ता से बाहर रहें.

बटाईदारी पर फिर मचा बवाल

पटना:उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बटाईदारों को पचास हजार का किसान विकास पत्र दिये जाने की घोषणा के बाद से राज्य की राजनीति एक बार फिर गरमा गयी है.जहां विपक्षी दल इस मुदïदे को हवा दे रहे हैं वहीं भाजपा के कई बुजूर्ग नेता मोदी के हाथों से पार्टी का नेतृत्व छीनने की वकालत करने लगे हैं. अपने ही दलों के नेताओं के विरोध में उठ खड़े होने के कारण मोदी सफाई की मुद्रा में आ गये हैं इस बार पार्टी में मोदी के विरोधियों को उन्हें घेरने का बड़ा हथियार हाथ लगा है.इससे वे मोदी को आम जनता के सामने भी बेनकाब करना चाह रहे हैं ताकि वे यह जान सकें कि मोदी की सोच जमीन मालिकों के प्रति कैसी है.हांलांकि अपनी सफाई में मोदी ने कहा कि केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) के जरिये कोई बटाईदार किसी भी सूरत में जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं कर सकता है. दुनिया की कोई भी ताकत भूमि मालिकों को जमीन से जुदा नहीं कर सकती है. ऐसा कोई कानून है ही नहीं. उन्होंने भाजपा में अपने खिलाफ भड़के गुस्से पर कोई टिप्पणी नहीं की और इस आशय के तमाम सवालों को वे 'नो कमेंटÓ बोल टालते चले गये. हां, पत्रकारों से उन्होंने यह जरूर कहा कि क्या ऐसे बेतुके मसले राजग के वोटरों को भ्रमित कर सकते हैं. राजद व लोजपा ने अपने राजनीतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए बटाईदारी के मसले पर अनावश्यक भ्रम फैला रखा है. उनकी तमाम पक्षों से अपील रही कि सतही राजनीति के चक्कर में राज्य में कायम सदभाव को न बिगाड़ें. उन्होंने कहा किÓप्रदेश की एक करोड़ चार लाख होल्डिंग में 92.5 प्रतिशत लघु व सीमांत किसान हैं. ये बस एक से दो हेक्टेयर जमीन के मालिक हैं. इनकी स्थिति बटाईदार और मजदूरों से भी बदतर है. बिहार क्या, भारत में भी ऐसा कोई कानून नहीं है, जो इनको जमीन के मालिकाना हक से बेदखल कर सके. हमने तो ऐसे किसी कानून के बारे में सपने में भी नहीं सोचा है. इसी क्रम में मोदी ने एक प्रसंग का जिक्र किया किÓ1967 की मिली-जुली सरकार में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जनसंघ भी था. वामपंथी पार्टियों के दबाव पर बटाईदारी कानून लाने की कोशिश हुई. इसको रोकने के लिए जनसंघ कोटे के मंत्री कैबिनेट की बैठक में ही कम्युनिस्ट मंत्रियों से उलझ गये थेÓ उन्होंने कई मर्तबा दोहराया-Óबटाईदार कानून के बारे में कोई सुझाव, विचार, पहल या प्रस्ताव नहीं है. किसी को भ्रमित होने की दरकार नहीं है. उनके अनुसार केसीसी के बारे में हमने कुछ नहीं किया है. हमने बस नाबार्ड के गाईडलाईन को दोहराया है. यह व्यवस्था 2000 से है. हमें इसमें संशोधन का भी अधिकार नहीं है. केसीसी का भूमि सुधार, वंदोपाध्याय कमेटी या बटाईदारी कानून से कोई मतलब नहीं है. बटाईदारी पर भाजपा के ही लोगों ने बावेला मचाया है खुद उसके विधायकों ने इस मुददे पर मोदी के खिलाफ आग उगल रहे हैं ऐसे में विरोधी दल वाले तो रोटी सेकेंगे ही.सो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद इसे इश्यू बनाने से कैसे चूकते. उनके अनुसार बटाईदारी व खेती करने वालों को किसान क्रेडिट कार्ड दिए जाने के सरकार के बयान से गांव-गांव में बवाल मचा हुआ है. इससे खुद सत्ताधारी दल के नेताओं के बीच घमासान की स्थिति पैदा हो गयी है. सरकार रोजाना जनता के बीच भ्रम उत्पन्न कर रही है.
बटाईदारी पर चर्चा करते हुए लालू प्रसाद ने कहा कि यह किसी जाति विशेष का मामला नहीं है. गांव में दो-चार बीघा जोत का व्यक्ति बाहर नौकरी करता है. ऐसी स्थिति में उसको जमीन से हाथ धोना पड़ेगा. सरकार ने प्रमण्डलीय आयुक्तों को कोई निर्देश नहीं दिया और कह दिया कि खेत जोतने वाले को किसान क्रेडिट कार्ड मिलेगा. जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड है भी तो रुपया नहीं मिला है.

सुर-संग्राम के विजेता आलोक को फैसले पर ऐतराज

पटना: सुर-संग्राम का फाइनल ऐतिहासिक गांघी मैदान में एक खूबसूरत मुकाम पर पहुंच कर संपन्न हुआ. बिहार के आलोक कुमार व उत्तर प्रदेश के मोहन राठौर को संयुक्त रूप से विजेता घोषित करते हुए आयोजकों ने 25-25 लाख रुपये का चेक व बाइक की चाबी थमा दी पर इस कार्यकम के विजेता आलोक कुमार को इस बात का मलाल है कि उन्हें दो प्रतिशत अधिक मत आने के बाद भी एकल विजेता क्यों नहीं घोषित किया गया. शनिवार को लोजपा कार्यालय में आलोक का भव्य स्वागत किया गया. राज्य का नाम रौशन करने वाले इस कलाकार को लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान, प्रदेश लोजपा अध्यक्ष पशुपति नाथ पारस और दलित सेना के राष्टï्रीय अध्यक्ष रामचन्द्र पासवान ने मिठाई खिलाया और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की.आलोक राज्य के लखीसराय का निवासी है.
आलोक से जब यह पूछा गया कि उन्हें दो प्रतिशत अधिक मत आने के बाद भी क्यों नहीं विजेता घोषित किया गया इस पर अपनी प्रतिक्रिया में आलोक ने कहा कि किस नियम के तहत ऐसा किया गया यह तो महुआ चैनल ही जाने पर दो प्रतिशत अधिक वोट काफी अधिक होता है.प्रतियोगिता में एक-एक वोट कीमत होती है. आयोजकों द्वारा दोनों को 25-25 लाख प्रदान करना दूसरी बात है पर उसे मंच पर विजेता घोषित करना चाहिए था.उल्लेखनीय है कि कार्यक्रम के संचालक व एंकर भोजपुरी फिल्म के सुपर स्टार रवि किशन बार-बार यह कहते सुने गये कि जीतेगा बिहार कि यूपी इसका फैसला प्रतिभागियों को प्राप्त वोटों से पता चलेगा पर ऐन वक्त पर दोनों को विजेता घोषित कर दिया गया.

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

कोई खैरा का यह दर्द समझने क्यों नहीं आता

प्रदेश के मुंगेर जिले खैरा गांव में आजादी के 63 वर्षोंं के बाद भी शुद्घ पेयजल की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है यहां के पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा विश्व मानदंड से दस गुनी अधिक है. परिणाम स्वरूपम यहां आज भी बच्चे लंगड़े व अपंग पैदा हो रहे हैं. खैरा में पेयजल की समस्या को दूर करने के लिये अब तक करोड़ो रूपये खर्च भी हुए पर अभी तक कोई परियोजना कारगर साबित नहीं हो पायी है जिससे यहां के ग्रामीणों को शुद्घ पेयजल नसीब हो. 75 लाख रुपये खर्च तक वाटर टैंक लगाने की योजना प्रारंभ हुई योजना पूर्ण भी हुआ पर तकनीकी आधार पर त्रुटि के कारण यह परियोजना भी फेल हो गयी इतनी राशि खर्च होने के बाद भी इस नलकूप परियोजना से प्राप्त पानी में अर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा नियंत्रित नहीं हो पायी. परिणामस्वरूप इस परियोजना को बन्द कर दिया गया. सिर्फ खैरा ही नहीं मुंगेर जिले के खडग़पुर अनुमंडल के आस-पास के गांवों व गर्म झील के पानी में रेडियो एक्टिव मेटेरियल रेडाल की मौजूदगी से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया जाता है. बावजूद इसके पूरे अनुमंडल क्षेत्र में, पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा सकी है. खैरा की स्थिति का जायजा लेने तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम भी पहूंची थी और वहां की पानी की जांचोपरांत पीने के अयोग्य करार दे दिया था. खैरा की स्थिति तो यह है कि ग्रामीण, राजनेताओं को गांव में घुसने नहीं दे रहे. गत विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी वादों में खैरा के पेयजल आपूर्ति की समस्या को दूर करने की घोषणा की थी पर इसके लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस प्रयास नहीं किये जाने पर ग्रामीणों में वर्ष 2008 में ग्रामीणों ने स्थानीय जदयू विधायक अनन्त कुमार सत्यार्थी को गांव में प्रवेश करने पर उनका जमकर विरोध कर दिया था. जिस पर विधायक अनन्त कुमार सत्यार्थी ने भी ग्रामीणें की शिकायत को जायज ठहराते हुए जिले के आला अफसरों पर इस समस्या के प्रति विमुख होने का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार से इस पर पहल करने की मांग की थी. इसके बावजूद खैरा एवं आसपास के इलाके के पेयजल की समस्या को हल करने के प्रति सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयास प्रारंभ नहीं किये गये हैं. जिससे यहां के ग्रामीण आर्सेनिक व फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर है. परिणामस्वरूप यहां जन्म लेने वाला बच्चा आज भी अपंग पैदा हो रहा है.

इस तरह कट रहा हमारा डॉल्फिन

मो.शमशाद आलम
: गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित कर दिये जाने से इस जीव के विलुप्त होने के खतरे पर अब शायद अंकुश लग जाए. पर सिर्फ घोषणा मात्र से इसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि यह जीव अपनी मौत नहीं मर रहा बल्कि उन्हें उंची कीमत के लोभ में गंगा की तटों पर बसे लोग व मछुआरे मार रहे हैं. आज भी मुंगेर, सुल्तानगंज एवं भागलपुर के बाजार में गंगा डॉल्फिन की चर्बी पांच सौ रूपये प्रति किलो की दर से खुलेआम बेची जा रही है. 5 अक्तूवर के बाद से हालांकि स्थिति कुछ बदली है. 6 अक्तूवर तक सभी समाचार पत्रों में गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जीव घोषित किये जाने की खबर को पढऩे के बाद इस जीव को गंगा नदी में मारकर खुलेआम बेचने वाले लोग चौकन्ना हो गये हैं. बिहार के, मुंगेर, सुल्तानगंज के आसपास गंगा नदी में गंगा डाल्फिन पायी जाती हें. गंगा के तटीय इलाके के लोग इसे सोंस के नाम से जानते हैं. एक सर्वे के मुताबिक गंगा नदी में अब सिर्फ 700 से 800 डाल्फिन शेष रह गयी हैं. जिस तेजी से इस जीव का मारा जा रहा है इसे नहीं बचाया गया तो यह विलुप्त हो ही जाता. इसे देखते हुए इसे सही समय पर राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है. अब इसे मारने वाले के साथ-साथ इसका अन्य रूप में उपयोग करने वाले भी दंडित होंगे. पर इसके लिए सरकारी तंत्र को ईमानदार पहल करनी पड़ेगी, क्योंकि गंगा डाल्फिन की चर्बी का उपयोग मछुआरे बचवा मछली पकडऩे में चारे के रूप में प्रयोग करते हैं.ऐसे में राष्टï्रीय पक्षी मोर और राष्टï्रीय पशु बाघ की रक्षा की तुलना में इस जीव की सुरक्षा काफी कठिन होगी. जिसके लिए अलग से टास्क फोर्स बनाकर ही इस जीव की रक्षा संभव है अन्यथा इसका अवैध शिकार निरंतर जारी रहेगा और एक दिन चीन की ही तरह यहां से भी यह विलुप्त हो जायेगा. इसलिये इस जीव को विलुप्त होने से बचाने का एक ही उपाय है, कि मछूआरों और गंगा के तटीय क्षेत्र में बसे लोगों को इस जीव के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए साथ ही उनके बीच इस बात को भी प्रचारित कराया जाए कि सोंस को गंगा की सवारी माना जाता है, जिसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है.इस बात के प्रचारित होने से धर्म प्रेमी सज्जन इसे मारने से बचेंगे साथ में लोगों को भी इससे रोकेंगे.

औषधि जांच मशीन सात वर्षों तक पड़ी रही

औषधि नियंत्रण विभाग के आलाधिकारियों एवं नकली दवा निर्माताओं की सांठ-गांठ के कारण पटना स्थित औषधि प्रयोगशाला में मशीन आ जाने के बावजूद अब तक हाई परफारमेंस लिक्विड को मेटोग्राफी (एच.पी.एल.सी) मशीन स्थापित नहीं हो पाया है, जबकि भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला (बीडीसीएल) अगमकुंआ, पटना को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए 10.18 लाख रुपये की लागत वाली यह मशीन सितम्बर 2002 में ही उपलब्ध करा दी थी. जिस पर इसके बावजूद सात वर्षों तक मशीन यूं ही पड़ी रही कैग ने गंभीर आपत्ति जताते हुए सरकार से स्पष्टïीकरण तलब किया है. राज्य की पिछली राजद सरकार के कार्यकाल, सितम्बर 2002 में ही भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए हाई परफारमेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी मशीन प्रदान किया था. पर इसे स्थापित करने के लिए स्वास्थ्य निदेशालय ने बीडीसीएल को 15.43 लाख रुपये प्रयोगशाला के नवीकरण एवं मशीन की स्थापना के लिए जून 2007 में उपलब्ध कराया इस राशि में से बीडीसीएल ने, 3.95 लाख रुपये कार्यपालक अभियंता, पी.डब्लूडी को विद्युत कार्य के लिए और 4.07 लाख रुपये खाद्य प्रयोगशाला के सिविल कार्य के लिए उपलब्ध कराया था जबकि सिविल कार्य के प्राक्कलन की स्वीकृति आदेश की प्रत्याशा में विभाग ने 7.41 लाख रुपये की राशि को बैंक में जमा रखा. उधर विभाग ने जुलाई 2008 तक प्राक्कलन को स्वीकृत नहीं किया था. इस प्रकार औषधि परीक्षण प्रयोगशाला के भवन का सिविल व मरम्मत कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया. इतना ही नहीं विद्युत कार्य भी प्रारंभ नहीं हो सका. इसके लिए औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला ने कोई पहल भी नहीं और न ही खाद्य प्रयोगशाला के संबंध में सिविल कार्य का अनुश्रवण ही किया इसके बावजूद बीडीसीएल के प्रभारी अधिकारी में जुलाई 2008 में मशीन करने परिचालन में बता कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया जिस पर कैग ने, आपत्ति जताते हुए उनका जवाब स्वीकार्य नहीं किया उनका तर्क था कि कोई सिविल या विद्युत कार्य प्रारम्भ नहीं किया फिर किस प्रकार मशीन कार्य करने लगा. प्रभारी अधिकारी ने अक्टूबर 2008 में कैग को फिर सूचित किया कि प्रशिक्षित स्टाफ की अनुपलब्धता के कारण औषधि प्रशिक्षण नहीं हो सका जिसके लिए विभाग से पत्राचार किया गया फिर भी प्रीाारी आधारभूत संरचना की स्थिति एवं मशीन के परिचालन के बारे में व मौन रहे प्रभारी का जवाब कि मशीन का कोई परीक्षण कार्य नहीं किया गया इस बात को ठोस करता है कि मशीन निष्क्रिय था. इस प्रकार सात वर्ष पहले 2002 में भारत सरकार द्वारा जो मशीन प्रदान किया गया था उसे छह वर्ष बाद 2008 तक भी स्थापित एवं प्रचालित नहीं किया जा सका. परिणामस्वरूप औषधि परीक्षण के वांछित उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया जा सका और मशीन के साथ-साथ निधि भी अवरूद्घ रहा. कैग ने पूरे प्रकरण को साभार के समक्ष रखते हुए जवाब तलब किया है, पर सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली है.

हैण्ड पम्पों की मरम्मती के नाम पर डकार गये 91 लाख

पटना : ग्राम पंचायतों में हैण्ड पम्मों की मरम्मत एवं मरम्मत के साथ-साथ सफाई सुविधा के नाम पर 91.06 लाख रुपये की राशि का बंदरबांट किया गया. जिसके जांच के आदेश दिये गये हैं. मामला पीएचइडी मधेपुरा का है. यहां के कार्यपालक अभियंता पीएचइडी को 2001 से 2005 की अवधि में 12 प्रखण्डों के अंतर्गत 170 ग्राम पंचायतों को हैण्ड पंपों (एचपी) की स्थापना, साधारण मरम्मति, विशेष मरम्मति और सुलभ शौचालय को बनाने के लिए अग्रिम राशि के रूप में 91 लाख छह हजार रुपये उपलब्ध कराये गये. पंचायतों को मद बार खर्चों का विवरणी प्रत्येक अगले माह की 5 तारीख को और भौतिक और वित्तीय सफलताओं की मासिक व त्रैमासिक प्रगति प्रतिवेदन संबंधित कार्यपालक अभियंता को देना आवश्यक था साथ ही पंचायत द्वारा संधारित स्थल, लेखा बही संबंधित प्रमण्डलों द्वारा जांच किया जाना था पर ऐसा हुआ नहीं इसका खुलासा मार्च 2008 में जांच के दौरान हुआ डी.सी. विपत्र में न तो खर्च की विवरणी है और न ही 91.06 लाख रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र ही तीन से छह वर्ष बीतनेक के बाद भी प्रस्तुत किया गया. जून 2008 में इस संदर्भ में कैग ने मामले की उजागर किया. न तो कनीय अभियंता और न ही सहायक अभियंता ने स्थल लेखा पंजी को जांचा. इस संदर्भ में राज्य सरकार ने उपयोगिता प्रमाण पत्र की प्रस्तुति सुनिश्चित करने हेतु ठोस और प्रभावी कदमों को लेने के लिए उपविकास आयुक्त डीडीसी एवं अन्य क्षेत्रीय अधिकारियों को आवश्यक निर्देश निर्गत करने के लिए जिलाधिकारी मधेपुरा को लिखा बावजूद इनके उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं प्रस्तुत किया गया. परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने 2005-06 के लिए निधि की स्वीकृति नहीं दी. जुलाई 2008 में कार्यपालक अभियंता पीएचइडी मधेपुरा ने जवाब दिया कि उपयोगिता प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु संबंधित पंचायतों को लिखा गया है पर उनका जवाब प्राप्त नहीं हुआ है. इतने के अलावे, संबंधित पंचायत के मुखिया एवं पंचायत सेवकों के विरूद्घ कोई अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई. साथ ही विभाग योजना निधि की राशि 91 लाख छह हजार रुपये की उपयोगिता सुनिश्चित करने में विफल रहा. स्थल लेखा का जे.ई. और ए.ई. द्वारा जांच के बिना यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका कि काम वास्तव में पूरा किया गया है. कैग ने इस मामले को सरकार को प्रतिवेदित कर दिया है. पर पीएचइडी ने इस प्रकरण ने ठोस कार्रवायी नहीं की है.

शनिवार, 26 सितंबर 2009

बिहार में कांग्रेस से क्यों डरने लगी पार्टियां

पटनाः मुख्यमंत्री nitish कुमार ने चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा सावधानी हटी दुर्धटना घटी. यानि फिर से लालू का भय दिखाने का प्रयास प्रारम्भ. मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार लिया है कि कांग्रेस ने उनको नुक्सान पहुंचाया है. और उनके आधार मतों में सेंधमारी करने में सफल रही है. मतलब साफ है. आगामी विधानसभ चुनाव में कांग्रेस राजग और राजद लोजपा दोनों के लिए परेषानी खड़ी करने वाली है! गत लोकसभा चुनाव के दौरान राजद-लोजपा ने अपने खराब प्रदर्षन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था इस बार राजग कांग्रेस पर यह आरोप लगा रहा है.आखिर माजरा क्या है. क्या सही में मृतप्राय कांग्रेस पुर्नजीवित हो गयी है या फिर नीतीष कुमार राज्य के उन मतदाताओं को कांग्रेस की ओर जाने से रोकना चाहते हैं जिन्हें राजद-लोजपा से परहेज है! चुनाव परिणामों को देखने से तो यही लगता है कि कांग्रेस ने पुर्नवापसी की है. जिन दो सीटों पर उसने जीत दर्ज करायी है वह सीट राजद और राजग के आधार वोट बैंक से जुड़ा हुआ है. इस लिए कांग्रेस की पुर्नवापसी राजद-लोजपा और राजग दोनों के लिए परेषानी पैदा करनेवाली है. यह बात अलग है कि चुनाव परिणाम से ज्यादातर राजग के उम्मीदवार ही प्रभावित हुए हैं पर सिमरीबख्तियारपुर और चेनारी विधानसभा क्षेत्र के आधार मतों को देखा जाए तो साफ लगेगा कि राजग और राजद के आधार मतों पर समान रूप से कांग्रेस ने सेंधमारी की है. सिमरीबख्तियारपुर विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम व यादव बहुल क्षेत्र होने के कारण वहां से महबूब अली कैसर की जीत राजद-लोजपा के लिए झटका है जबकि चेनारी में सवर्ण मतदाताओं के प्रभाव वाले इस सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज कर राजग को करारा झटका दिया है. इन अठारह सीटों में से एक भी सीट कांग्रेस की नहीं थी पर उसने दो सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ताधारी दल भाजपा की बराबरी की है. इस उपचुनाव में भाजपा छह सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसने अपने दो उम्मीदवार जीताये जबकि जदयू बारह में से मात्र तीन सीट ही निकाल पायी. कांग्रेस ने दोनों सीटें जदयू से छीना है इसमें से सिमरीबख्तियारपुर की सीट कांग्रेस की परम्परागत सीट मानी जाती रही है. यहां से चैधरी सलाह उददीन लगातार जीतते रहे थे.अब उस सीट पर उनके पुत्र चैधरी महबूब अली कैसर चुनाव लड़ते हैं. गत विधानसभा चुनाव में वहां जदयू ने बाजी मारी थी. कांग्रेस की इस वापसी को दो नजरिये से देखा जा रहा है. पहला यह कि राजद-लोजपा से गत लोकसभा चुनाव के दौरान अलग हो चुनाव लड़ने और उपचुनाव में पुनः प्रयास के बावजूद राजद-लोजपा से समझौता नहीे कर कांग्रेस ने राज्य के उन मतदाताओं के लिए एक विकल्प खोल दिया है जो राजद और राजग दोनों की कार्यषैली से उब चुके थे. वैसे मतदाताओं ने नीतीष कुमार से मुक्ति के लिए कांगेस को अपना समर्थन दे दिया परिणामस्वरूप दो सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीत कर राज्य की अन्य राजनीतिक पार्टियों की चिन्ता बढ़ा दी है. कांग्रेस ने अठारह में दो कर परफार्म तब किया है जब उनके स्टार प्रचारक सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इस उपचुनाव में प्रचार के लिए नहीं आये. यह परिणाम बिहार प्रभारी जगदीष टाईटलर,सी.पी.जोषी और सलमान खुर्षीद जैसे केन्द्रीय मंत्रियों के साथ साथ प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष अनिल षर्मा की मेहनत का फल माना जा रहा है. 2010 में विधानसभा का फाईनल होने वाला है जिसमें कांग्रेस पूरे दम खम केसाथ उतरने की तैयारी में जुट गयी है.बिहार प्रभारी जगदीष टाईटलर ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस अब बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ेगी किसी के साथ समझौता नहीं करेगी यही कारण है कि जदयू और राजद-लोजपा दोनों की बेचैनी बढ़ी हुई है.बात यह है कि कांगे्रस के अकेले चुनाव मैदान में उतरने से जहां राजद-लोजपा को अपने आधार वोट बैंक अल्पसंख्यक मतों के खिसकने का डर खाये जा रहा है तो राजग को सवर्ण मतदाताओं का कांग्रेस के साथ चले जाने की चिन्ता है.यही कारण है कि उपचुनाव के दौरान राजद-लोजपा और राजग नेताओं के निषाने पर कांग्रेस पार्टी रही और गठबंधनों के बड़े नेताओं ने कांग्रेस की कमजोरियों को जम कर जनता के बीच उछाला.

एम्स की निर्माण लागत तीन गुणी बढ़ी

पटनाः पांच साल पहले पटना में बनने वाले जिस आल इंडिया इंस्टिच्यूट आफ मेडिकल साइंस पटना का डिजाइन देर से स्वीकृति होने के कारण लागत बढ़ गयी है विलंब के कारण इस संस्थान के निर्माण की लागत 332 करोड़ से बढ़कर 843 करोड़ रुपये हो गयी है.. निर्माण कार्य आरंभ करने के लिए अगले सप्ताह टेंडर निकाले जाएंगे. ज्ञात हो कि यहां आवासीय परिसर बन रहा है. अस्पताल निर्माण के लिए अगले सप्ताह टेंडर निकाल दिए जाएंगे. इसके निर्माण कार्य के लिए मंत्रालय ने कई तकनीकी एजेंसियों से सहयोग लिया है. अस्पताल के निर्माण में हिन्दुस्तान लैटेक्स लिमिटेड मंत्रालय को सहयोग करेगा. पहले यह काम हास्पिटल सर्विसेज कन्सेल्टेंसी कारपोरेशन के जिम्मे था पर इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए राज्य सरकार ने 100 एकड़ जमीन मुहैया करायी है. खगौल स्थित सिंचाई अनुसंधान परिसर की 33 एकड़ जमीन आवासीय परिसर और फुलवारीशरीफ स्थित वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट इंस्टीच्यूट में मुख्य भवन के लिए 77 एकड़ जमीन दी गयी है. संस्थान में मेडिकल की पढ़ाई भी होगी और प्रत्येक वर्ष सौ छात्र-छात्राओं का नामांकन हो सकेगा. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों की इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं होने के कारण ही अब तक इसके डिजाइन को स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. काउंसिल फार प्रोटेक्शन आफ पब्लिक राइट्स वेलफेयर की याचिका पर पटना उच्च न्यायालय ने जब निर्माण कार्य शीघ्र शुरू कराने के आदेश दिए तब मंत्रालय सक्रिय हुआ और आरडीबी इंडस्ट्रीज से इसका डिजाइन तैयार कराया. जिसे मंत्रालय की तकनीकी कमेटी ने मंजूरी दे दी है. निर्माण कार्य दो सालों में मुकम्मल करने का लक्ष्य रखा गया है. याचिका दायर करने वाली संस्था के महासचिव महेंद्र प्रसाद गुप्ता ने बताया कि विलंब के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार दोनों के ही अधिकारी समान रूप से कसूरवार हैं. उनके खिलाफ कार्रवायी होनी चाहिए. इसी के कारण लागत करीब तीन गुना बढ़कर 847 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी है. राजद नेता वीरेन्द्र कुमार ने कहा कि राज्य सरकार ने अभी तक जमीन को केन्द्र सरकार के नाम ट्रांसफर नहीं किया है. बिजली, पानी एवं सड़क भी मुहैया नहीं करायी गयी है. इससे योजना समय पर पूरा हो भी जायेगा इसमे संदेह ही है. ंपूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह षेखावत ने 3 जनवरी, 2004 को इसकी आधारशिला रखी थी. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत आठ राज्यों में एम्स का निर्माण किया जाना है जिनमें बिहार के अलावा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश शामिल हैं.

राजधानी में फिर पन्पा अपहृण उधोग

पटनाः राज्य में अचानक से बढ़े अपराध के कारण पुलिस महकमें की कारगुजारियों पर प्रष्न लगा दिया है. अपहरण जैसी वारदातों के बढ़ने से राज्य सरकार पर विरोधियों का प्रहार तेज हो गया है और क हीं न कहीं सुषासन का नारा हवा हवाई होता नजर आ रहा है.खैर गनीमत इस बात की है कि राजधानी के एक स्कूल से अपहृत कक्षा एक के छात्र श्रेष्ठ संजय को पुलिस ने सारण जिले से मुक्त करा कर उनके परिजनों को सकुषल पहुंचा दिया है पर इस घटना के उपरान्त बच्चों के अभिभावकों में असुरक्षा की भावना तो घर कर ही गयी है. यही कारण है कि अब अपने बच्चों को रिक्षा-टैम्पो चालकों के सहारे छोड़ने की बजाये वे खुद कार्यालयों से फुर्सत ले स्कूलों तक अपने बच्चों को साथ लाने के लिए पहुंच रहे हैं. यह राज्य सरकार के लिए गंभीर चुनौती है क्योंकि आज से चार साल साल पूर्व ला एण्ड आर्डर की स्थिति कुछ ऐसी ही थी जिसे मुद्दा बना राज्य की राजग सरकार राजग को उखाड़ फेंकने में सफल हो गयी थी. एडीजीपी हेडक्वाटर्स नीलमणि ने अपराधियों के चंगुल से बरामद श्रेष्ट को सारण जिले के बनियापुर के एक मकान में रखे जाने की बात कही है. वहीं से पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया है. क्राइस्ट चर्च स्कूल में कक्षा एक का छात्र श्रेष्ठ संजय उर्फ मोहित को उस समय अगवा किया गया था जब वह आटो से स्कूल जा रहा था. उसका आटो गांधी मैदान से गुजर ही रहा था तभी तीन मोटरसाइकिल सवार अपराधियों ने आटो को रोक लिया और श्रेष्ठ को लेकर फरार हो गए थे. श्रेष्ठ के पिता संजय श्रीवास्तव एक फार्मास्यूटिकल्स कंपनी में क्षेत्रीय प्रबंधक के पद पर कार्यरत बताये जाते हैं. श्रेष्ठ के घर लौटने से उसके परिजन तो खुष हैं ही साथ में पटना पुलिस ने भी राहत की सांस ही है.

उपचुनाव में दलबदलुओं को करारा झटका

पटनाः उपचुनाव में दलबदलुओं को जनता ने करारा झटका लगाया है. उप चुनावों के परिणाम अधिकांश स्थानों पर चैंकाने वाले रहे. लोकसभा चुनाव में औंधे मुंह गिरे राजद-लोजपा गठजोड़ ने दमदार वापसी की. इनकी ठण्डी पड़ी दुकानें फिर से सज गयी हैं. राजद से जदयू में गये बोचहां व फुलवारी शरीफ के विधायक रमई राम व श्याम रजक चुनाव हार गये. राजद ने दोनों सीटें बरकरार रखीं हैं. गौरतलब है कि इन दोनों नेताओं ने पिछले पन्द्रह सालों से राजद की राजनीति की थी और लालू यादव के खासमखास में से एक रहे थे. ऐसे में राजग कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के गले वे आसा नी से नहीं उतर रहे थे. यही कारण रहा कि कार्यकर्ताओं ने बेमन से प्रचार अभियान का संचालन किया और नतीजा सामने है. दूसरे यह कि पुराने परिसीमन के आधार पर हुए इस उपचुनाव में राजद के उम्मीदवारों के लिए यह क्षेत्र सेफ माना जा रहा था. जिसका लाभ राजद उम्मीदवार को मिला और फुलवारी और बोचहा दोनों जगह राजद उम्मीदवारों ने अपने पुराने दिग्गजों को पटखनी दे दी.फुलवारी विधानसभा क्षेत्र में जदयू के श्याम रजक को राजद के उदय मांझी ने कड़े मुकाबले में 1274 मतों से पराजित किया. मांझी को यहां 44,485 वोट मिले जबकि रजक 43,211 वोट पर सिमट गये. कांग्रेस के संजीव प्रसाद टोनी 19,406 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे जबकि भाकपा के अकलू पासवान को 5115 मतों से ही संतोष करना पड़ा.निर्दलीय दिलिप कुमार को 1825 और अरविन्द कुमार को 1115 मत मिले. पुराने परिसीमन पर हुए इस अंतिम चुनाव में ष्याम रजक को राजद छोड़ना महंगा पड़ा और वे चुनाव हार गये. उनके हार के पीछे कई कारण प्रमुख रहे. पहला यह कि राजद के साथ इतने लम्बे समय तक रहने के बाद राजद को बुरे दिनों में छोड़कर जदयू में भागना उनके क्षेत्र के मतदाताओं को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इसे अवसरवादिता की श्रेणी में रखते हुए उनके खिलाफ मत दे दिया जिस कारण उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. दल-बदलने का खामियाजा रमई राम को भी भुगतना पड़ा. वे लोकसभा चुनाव में राजद का टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस की टिकट पर गोपालगंज से चुनाव लड़े और हार गये. फिर उन्होंने जदयू का दामन थाम लिया और बोचहा से विधानसभा उपचुनाव लड़े जहां उन्हें राजद के उम्मीदवार मुसाफिर पासवान ने 4026 मतों के अन्तर से परास्त कर दिया.

इस झटके से उबरने में लगेगा समय

शमशाद पटनाः अभी मई में राजग खेमे में लोकसभा की 33 सीटों पर जीत हासिल करने के जष्न की छमाही भी पूरी नहीं हुई कि विधानसभा उपचुनाव में उनका सारा मजा काफूर हो गया. यह क्या 18 में से नौ सीटों को राजद-लोजपा गठबंधन ने जीत लिया जबकि इनमें से ज्यादातर सीटें राजग की ही थी. यह कमाल कैसे हुआ. क्यों इस चुनाव में नीतीष-मोदी का जादू नहीं चला और क्यों राजद-लोजपा का पुर्नजन्म हुआ. खतरा यह है कि विधानसभा उपचुनावों के 18 सीटों के परिणामों से जब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उबरेंगे तब तक फाइनल मुकाबले की घड़ी आ जायेगी. यही कारण है कि राजग की इस करारी हार को राजद-लोजपा के लिए संजीवनी माना जा रहा है. अठारह में से नौ सीटों पर जीत के बाद राजद लोजपा कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह देखने से तो यही लगता है कि वे आगामी विघानसभा चुनाव में अभी से अपनी फतह मान लिये हंै दूसरी ओर राजग खेमे में घोर उदासी है.परिणाम को एक दूसरे पर थोपा-थोपी का सिलसिला अलग प्रारम्भ हो गया है.मुख्यमंत्री के कार्यकलापों पर भी प्रष्नचिन्ह लगाये जा रहे. हार के पीछे टिकटों के बंटवारे और बदबदलुओं को प्रश्रय देने पर भी निषाना साधा जा रहा है. कुल मिलाकर देखा जाए तो राजग उहापोह की स्थिति में है.आत्ममंथन जदयू और भाजपा दोनों खेमे में किया जा रहा है कि सुषासन में कहां चूक हुई कि जनता ने उन्हें ऐसा झटका दिया. फटे को रफू के प्रयास प्रारम्भ कर दिये गये हैं ताकि आगे सब ठीक ठाक रहे.बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है.18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं. दूसरी तरफ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं. राज्य में राजनीतिक हाषिये पर चली गयी कांग्रेस ने जदयू की दो सीटों को अपने कब्जे में कर दमदार वापसी की है. बहुजन समाज पार्टी ने भी एक सीट ले कर सबको चैंका दिया है जबकि निर्दलीय उम्मीदवार को एक सीट मिली है.बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था. रामविलास पासवान की लोजपा का तो सूपरा ही साफ हो गया था. स्वयं रामविलास पासवान चुनाव हार गये थे.इसके मद्देनजर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफी चैंकाने वाले हैं.कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की खामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं. राजग द्वारा टिकटों के बंटवारे में परिवारवाद को नकारने को भी हार के एक कारण के रूप में देखा जा रहा है. क्योंकि जिन सांसदों ने अपने परिजनों के लिए टिकट मांगे थे नहीं मिलने पर वे राजग द्वारा भेजे गये उम्मीदवारों को हराने में जुट गये. घोसी में तो सांसद जगदीष षर्मा ने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतार दिया और वे जीती भी. इस प्रकार उपचुनाव में राजग को अपनों के भीतरघात का भी सामना करना पड़ा. राजग के खिलाफ उनके दल के नेताओं का गुस्सा यूं ही नहीं है. जदयू के नेताओं का ही आरोप है कि फरवरी 2005 के उन दिनों को याद करें जब राज्य में नीतीष कुमार के नेतृत्व में सरकार बननी थी पर राजद के दबाव में राज्य में राष्ट्रपति षासन लागू कर दिया गया और बूटा सिंह को राज्य की कमान सौंप गयी थी. तब लोजपा तोड़कर नागमणि, नरेन्द सिंह जैसे नेताओं ने जदयू में षामिल होकर नीतीष कुमार को षक्ति प्रदान की थी. प्रभूनाथ सिंह, दिग्विजय सिंह,डा.मोनाजिर हसन, उपेन्द्र कुषवाहा जैसे नेता जदयू में पहले से ही मौजूद थे. नवम्बर 2005 में फिर से चुनाव हुए और राजग की सरकार बनी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीष कुमार विराजमान हुए. पर जैसे जैसे समय बितता गया नीतीष कुमार जदयू में मौजूद विभिन्न जाति के कद्दावर नेताओं का कद छोटा करना प्रारम्भ किया. पहले षिकार उपेन्द्र प्रसाद कुषवाहा हुए. जार्ज को अध्यक्ष पद से जलील कर हटाया गया. उसके बाद डा.मोनाजिर हसन से भवन निर्माण विभाग वापस ले लिया गया जबकि 2009 के लोकसभा के चुनाव में जार्ज फर्नांडीस, दिगिवजय सिंह और बेटिकट कर दिया गया जबकि प्रभूनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में वे प्रचार करने तक नहीं गये. इससे जदयू के आधार मतदाताओं में गलत संदेष चला गया परिणामस्वरूप प्रभूनाथ सिंह चुनाव हार गये. दिग्विजय सिंह का टिकट काटने और प्रभूनाथ सिंह के चुनाव प्रचार में न जाने को राजपूत मतदाताओं ने गंभीरता से लिया और मौके की तलाष में रहे. नजदीक में उपचुनाव मिल गया और उन्होंने अपना विरोध राजग के उम्मीदवारों के खिलाफ मत दे कर किया.कुछ यही स्थिति कुषवाहा नेताओं के साथ हुआ. उपेन्द्र कुषवाहा और नागमणी ने इस चुनाव में अहम रौल अदा किया. इसके अलावे सांसद बने विधायकों की पसंद को नजर अंदाज कर अन्य उम्मीदवारों को टिकट थमा देने के कारण स्थिति विस्फोटक हो गयी. मुंगेर में डा.मोनाजिर हसन की पसन्द के उम्मीदवार को ऐन वक्त पर टिकट से वंचित करने के कारण वे चुनाव प्रचार से अलग हो गये और मुंगेर गये ही नहीं जिससे वहां से जदयू उम्मीदवार हार गया और राजद उम्मीदवार की जीत हुई.नीतीष कुमार ने मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए कई अच्छे काम भी प्रारम्भ किये पर दूसरी ओर जदयू के पुराने व जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं का पर कतरना भी प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर वैसे जनाधारविहीन मुस्लिम नेताओं की जदयू में पूछ बढ़ा दी जो कभी चुनाव लड़े ही नहीं थे. इनमें अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष नौषाद अहमद, गुलाम रसूल वलियावी आदि को अनावष्यक तरजीह देने से जदयू के पुराने मुस्लिम नेताओं में आक्रोष बढ़ना प्रारम्भ हुआ और उनलोगों ने दल की गतिविधियों से खुद को अलग थलग करना प्रारम्भ कर दिया. इसे भी हार के मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है. उधर अन्य दलों से आये दलबदलुओं को जदयू में तरजीह दिये जाने के कारण मतदाताओं ने वैसे नेताओं के खिलाफ मत दिया परिणामस्वरूप फुलवारीशरीफ विधानसभा क्षेत्र से श्याम रजक और बोचहा से रमई राम चुनाव हार गये. उपचुनाव में हार का कारण बटाईदारी बिल का प्रचारित होना भी एक कारण माना जा रहा है जिससे गांव के किसान राजग के खिलाफ हो गये और समय रहते नीतीष कुमार से पल्ला झाड़ने में अपनी भलाई समझी और उन्होंने सत्ता के सेमी फाइनल में सरकार को यह जता दिया है कि कार्यसंस्कृति में बदलाव नहीं हुआ तो वे सरकार को ही बदल देंगे.उधर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार ने चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनके आधार मतों में कांग्रेस ने सेंधमारी कर ली जिससे राजद-लोजपा उम्मीदवारों को लाभ मिला साथ ही स्थानीय कारण भी इस उपचुनाव में हावी रहे दूसरी तरफ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित पुराने अंदाज में कहा कि सेमी फाइनल में जीत के बाद अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी.

शनिवार, 12 सितंबर 2009

फुलवारी में नहीं टूट रही मतदाताओं की चुप्पी

पटना: फुलवारीशरीफ विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं की चुप्पी सभी उम्मीदवारों को परेशान किये हुए है. ऐसे में इस बार अपनी जीत के लिए श्याम रजक को पापड़ बेलने पर रहे हैं. उन्हें कड़ी टक्कर राजद के उदय मांझी से मिल रही है. फुलवारी विधानसभा क्षेत्र में मांझी मतदाताओं की संख्या चालीस हजार के आसपास है और इसी वर्ग से उदय को राजद ने उम्मीदवारी सौंप दी है. इससे जदयू उम्मीदवार की परेषानी बढ़ गयी है उपर से कांग्रेस के संजीव प्रसाद टोनी का दबाव अलग है. परिणाम क्या होगा इस बारे में कोई दावे से नहीं कह सकता. दारोमदार सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं के रुख पर है वे जिधर जायेंगे पलड़ा उस उम्मीदवार की ओर झुक जायेगा. मुसलमानों का रुख इस बार पूरी तरह साफ नहीं दिख रहा है. रमजान के कारण वे चुप्पी साधे हुए हैं. राजद, जदयू और कांग्रेस इस वोट बैंक को रिझाने में लगा है. माले के अकलू राम की भी नजर इस वोट बैंक पर है. ऐसे में इस बार फंुलवारी विधानसभा क्षेत्र की राजनीति रोचक बन गयी है. यहां से राजद और जदयू ने अपने पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट न देकर दूसरे दल से आये नेताओं को उम्मीदवारी सौंपी है. जिससे दोनों उम्मीदवारों को नये मतदाताओं से रुबरु होना पड़ रहा है जिस कारण उन्हें मतदाताओं के मिजाज को समझने में परेषानी हो रही है. पुराने परिसीमन पर अंतिम बार हो रहे इस उपचुनाव में राजद अपनी पूरी ताकत झोंके हुआ है कारण अभी क्षेत्र उसके उपयुक्त है. नये परिसीमन में उसे परेषानी हो सकती है क्योकि आधार मतों में पुनपुन के जुड़ जाने से जदयू का पलड़ा भारी पड़़ सकता है. वैसे इस बार जदयू उम्मीदवार एन्टी इनकमवेन्सी फैक्टर से जूझ रहे हैं. जिसे वे पाटने में असफल रहे तो चुनाव का परिणाम उनके विपरित भी जा सकता है. मतदाता उनके सरोकारों से दूर रहने के कारण उनसे खफा है. जिसका लाभ राजद उम्मीदवार को मिलता दिख रहा है. चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नीतीष कुमार को खुद ष्याम रजक के खिलाफ जनता के जनाक्रोष को कई जगह झेलना पड़ा है. हालांकि नाराज जनता की नाराजगी को कम करने के लिए नीतीष कुमार ने पुरानी बातों को भूलने का आग्रह किया है और ष्याम को नहीं उन्हें वोट देने को कहा है. अब इसका कितना प्रभाव पड़ा है यह तो 15 सितम्बर को वोट वाले दिन ही दिखेगा. उधर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान संयुक्त रुप से चुनावी सभाओं को सम्बोधित कर चुके हैं उनका रोड षो भी हुआ जिसमें भारी संख्या में स्थानीय लोगों ने भी भाग लिया. मतदाताओं ने उनका जगह जगह स्वागत भी किया. नीतीष भी रोड षो में उतरे और मतदाताओं ने जदयू उम्मीदवार को सफल बनाने का आग्रह किया है.

राष्ट्रीय पोषण अभियान बिहार में फेल

पटनाः केन्द्र सरकार द्वारा राषि उपलब्ध कराये जाने के बावजूद राज्य सरकार के अधिकारियों की लेट लतीफी के कारण राषि खर्च नहीं हो पा रहा जिससे गरीब बच्चे सरकारी योजनाओं के लाभ से उपेक्षित हैं.अब पोषक सहायता राषि के आवंटन और व्यय को देखने से तो यही लगता है कि राज्य के अधिकारियों की लापरवाही के कारण केन्द्र द्वारा भेजे गये करोड़ो रुपये यूं ही पड़े रह गये पर गरीब किषोरियों को योजना का लाभ नहीं पहुंचाया जा सका. कैग ने राज्य सरकार के अधिकारियों की इस लापरवाही पर गहरा ऐतराज व्यक्त किया है. मामला औरंगावाद और गया जिले से जुड़ा है.राष्ट्रीय पोषाहार अभियान के अन्तर्गत किषोरी बालिकाओं के लिए पोषाहार योजना नाम से पायलट परियोजना राज्य के दो जिलों औरंगावाद और गया जिले में अगस्त 2002 में प्रारम्भ हुई. परियोजना के निर्देषानुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के किषोरी वालिकाओं और गर्भवती एवं षिषुवती माताओं को कुपोषण, सुक्ष्मपोषक की कमियों और पिछड़े जिलों जहां बालिकाओं और औरतों में कुपोषण थी में चिरकालिक उर्जा कमियों को कम करने के लिए प्रारंभिक रूप से तीन माह की अवधि के लिए 6 किलो अनाज प्रति लाभुकों को प्रति माह मुत दिया जाना था.लाभुक जो व्यवरूछेद वजन क्रमषः 35 और 40 किलो प्राप्त कर लिये तीन महीने के बाद अनाज नहीं प्राप्त करेंगे परन्तु उन लाभुकों के मामले में जो कम वजन के रहेंगे अनाज प्राप्त करते रहेंगे. इस योजना को बाल विकास परियोजना पदाधिकारी और जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम पदाधिकारी या जिला कल्याण पदाधिकारी के माध्यम से लागू किया जाना था पर ऐसा हुआ नहीं. जबकि इस योजना को जारी रखने के लिए केन्द्र सरकार ने मार्च 2004 और मार्च 2006 में दोनों जिलों के लिए निदेषालय आईसीडीएस, समाज कल्याण विभाग बिहार के माध्यम से 12.41 करोड़ रुपये विषेष रुप से अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता प्रदान किया.उसमें से दोनों कजले के कल्याण पदाधिकारी ने 6.58 करोड़ रुपये प्रत्येक 3.29 करोड़ रुपये प्रत्येक भारतीय खाद निगम एफसीआई गया को 11,100 मि.टन अनाज प्राप्त करने के लिए और 20.35 लाख रुपये हरेक जिले के राज्य खाद्य निगम को अनाज एफसीआई से उनके गोदाम में लाने का परिवहन मूल्य को चुकाने के लिए अग्रिम जून 2005 को दिया.नवम्बर 2008 तक एसएफसी औरंगावाद ने 530.12 मि.टन और एसएफसी गया ने 1274.16 मि.टन खाद्यान्न गेहूं का एफसीआई से उठाव किया था. जबकि इस कार्यक्रम के अन्तर्गत औरंगावाद में 31959 लाभुकों और गया में 73116 लाभुकों की पहचान की गयी थी. जिनके लिए 191.8 मि.टन और 365.6 मि.टन खाद्यान्न प्रतिमाह की जरूरत थी.5550 मि.टन के लिये अग्रिम और पूर्वोक्त मात्रा में खाद्यान्न आवष्यकता के विरूद्ध बाल विकास परियोजना पदाधिकारी औरंगावाद केवल 64.23 मि.टन खाद्यान्न चावल 43.72 मि.टन और गेहूं 20.51 मि.टन जो एक महीने के लिए भी पर्याप्त नहीं था का उठाव किया जबकि वाल विकास परियोजना पदाधिकारी गया 1007.89 मि.टन गेहूं विगत दो साल 2005-07 की अवधि में उठाव किया. इस प्रकार दोनों जिले में निधि उपलब्ध रहने के बावजूद खाद्यान्न का उठाव नहीं हो पाया जिससे वे इस कार्यक्रम को लागू करने में असफल रहे और विषेष अतिरिक्त सहायता के रूप में उपलब्ध कराये गये 12.42 करोड़ रुपये में से केवल 60 लाख रुपये यानि 4.83 प्रतिषत ही खर्च कर सके. परिणामस्वरूप एफसीआई व एसएफसी तथा जिला कल्याण पदाधिकारी के पास 11.82 करोड़ रुपये दो से चार वर्षों तक अवरूद्ध रहा पर एनपीएजी का लाभुकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका.जिससे राष्ट्रीय पोषण अभियान योजना का राज्य में वांछित उद्देष्य प्राप्त नहीं किया जा सका. कैग ने इस पर गहरी आपत्ति जतायी है और इस योजना से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवायी के लिए राज्य सरकार को अप्रैल 2008 में ही लिखा था पर सरकार ने दिसम्बर 2008 तक कोई कार्रवाई की सूचना कैग उपलब्ध नहीं करा पायी थी जबकि यह एक गंभीर मामला था.

रविवार, 30 अगस्त 2009

फुलवारीशरीफ उपचुनाव में मचेगा घमासान

पटना: फुलवारीशरीफ विधानसभा उपचुनाव में श्याम रजक जदयू के उम्मीदवार हैं जबकि उदय कुमार मांझी राजद के और कांग्रेस की टिकट पर संजीव प्रसाद टोनी ने नामांकन दायर किया वहीं माले से अकलू राम उम्मीदवार हैं। यहां की लड़ाई मजेदार है। ीरजद और जदयू दोनों ने ही अपने पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट न देकर दूसरे दल से आये उम्मीदवार को टिकट सौंप कर निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की है जबकि कांग्रेस और माले ने अपने पुराने कार्यकर्ताओं को चुनाव मैदान में उतारा है।फुलवारीशरीफ विधानसभा क्षेत्र से काग्रेस पार्टी से संजीव प्रसाद टोनी और माले से अकलू राम ने नाम निर्देशन का पर्चा दाखिल किया। नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में अकलू के पास इंदिरा आवास तो टोनी के पटना, रांची और दिल्ली में मकान दिखाया गया है। उधर भाकपा माले प्रत्याशी अकलू राम हत्या, मारपीट सहित कई अन्य मामले के आरोपी हैं। 21 अगस्त 07 को जमानत पर रिहा अकलू के पास रहने के लिए इंदिरा आवास, पानी पीने के लिए चापाकल और एक मोबाइल संपत्ति के रूप में है। पत्नी के पास चांदी के पायल और चेन हैं। ऐसे कम पूंजी के अकलू फुलवारी में जदयू और कांग्रेस के लखपति उम्मीदवारों के सामने कितना टिकते हैं यह वक्त बतायेगा। जो भी हो इस सीट पर सभों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। राजद को अलविदा कह जदयू की टिकट पर चुनाव लड़ रहे ष्याम रजक पर घोर अवसरवादिता कर आरोप है तो राजद उम्मीदवार भी दल बदल कर चुनाव लड़ रहे हैं। गत चुनाव में ष्याम रजक लगभग छह सौ मतों के अन्तर से चुनाव जीते थे यही कारण है कि वे राजद की बजाये इस उपचुनाव में जदयू उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव मैदान में हैं।

अधिकारी ऐसे खा रहे सरकारी माल

शमशाद
सिर्फ सहरसा में ही ऐसी अनियमितता नहीं है. मधुबनी के रहिका प्रखण्ड कार्यालय के अभिलेखों को खंगालने से भी सरकारी राशि के उलटफेर का मामला स्पष्टï हुआ है. सामान्य रोकड़ वही जो पूर्व के रोकड़पाल द्वारा अपने उततराधिकारी को सौंपा गया उसमें लम्बित, अग्रिम, 38.52 लाख रुपये, दिखाया गया था परंतु वास्तविक लंबित अग्रिम 34.18 लाख रुपये मात्र था. इस प्रकार अग्रिम के रूप में दिखाया गया 4.34 लाख रुपये की राशि फर्जी थे और उसका दुर्विनियोजन किया गया. इस कार्यालय में पूर्व के रोकड़पाल द्वारा चुनाव इत्यादि में खर्च करने के लिये 2.50 लाख रुपये का अग्रिम लिया गया पर इसका समायोजन नहीं किया गया.अप्रविष्टï प्रमाणक का दैनिक योग अप्रविष्टï प्रमाणक बही में 35.07 लाख रुपये के विरूद्घ कुल 37.52 लाख रुपये दिखाया गया था. इस प्रकार अप्रविष्टï प्रमाणक का जोड़ 2.45 लाख रुपये दिखा दिया गया. मधुबनी कोषागार से 2.37 लाख रुपये एवं 6.09 लाख रुपये की निकासी कर ली गयी पर इसे रोकड़ वहीं में चढ़ाया ही नहीं गया. इस प्रकार 8.82 लाख रुपये सरकारी खजाना से बाहर रह गया. प्रखण्ड विकास पदाधिकारी ने फरवरी 2008 की लेखा परीक्षा की टिप्पणी को तथ्यपरक बताते हुए गलती करने वाले अधिकारियों से वसूली की बात कहीं थी. पर बीडीओ ने गलती करने वाले अधिकारी के विरूद्घ की गई किसी कार्रवाई की सूचना बीडीओ रहिका द्वारा नहीं दिये जाने पर कैग ने आपत्ति जतायी है. तथा 18.11 लाख रुपये के दुर्विनियोजन को इंगित करते हुए सरकार से रिर्पोट तलब किया है जिससे संबंधित विभा में खलबली मच गई है.

कृषि के विकास की राशि से खरीद लिए वाहन

शमशाद
पटना : बिहार के लोग खेती पर निर्भर हैं पर इस राज्य में कृषि पर अनुसंधान के लिए आये पैसों को डायवर्ट कर लग्जरी गाडिय़ां खरीद ली गयी जिससे छात्रों का शिक्षण और प्रायोगिक कार्य प्रभावित हुआ जबकि कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारी गाडिय़ों से सैर करते नजर आते हैं. इतना ही नहीं खरीदी गयी गाडिय़ों पर खर्च किये गये 28.30 को छात्रों की शिक्षा, यात्रा और शिक्षा देने, सुदृढ़ीकरण और शिक्षा के विकास मद में दिखा कर मामले को घालमेल करने का प्रयास किया गया. छात्रों को अत्याधुनिक शिक्षा देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने राज्य कृषि विश्वविद्यालय में कृषि शिक्षा के विकास और सुदृढ़ीकरण के लिए राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा समस्तीपुर को 2.27 करोड़ का अनुदान स्वीकृत किया जिसमें से 1.49 करोड़ विमुक्त हुआ. राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय ने 28.30 लाख खर्च कर चार गाडिय़ां खरीदीं, जिसमें तीन एम्बेस्डर कार, तीन वोलेरो और एक एम्बुलेन्स की खरीददारी की गयी. मिले अनुदान की रकम को कृषि के लिए अनुसंधान और शिक्षण को बेहतर बनाने की बजाये कारों के खरीद में लगा दिया. अगर कार्यालय कार्य के लिए गाडिय़ों की खरीद हुई भी थी तो उसे व्यय वाउचर में दर्शा देना चाहिए था पर वाउचर इस बात की पुष्टिï नहीं कर रहे थे कि गाडिय़ों की खरीद भी हुई यानि छात्रों की शिक्षा यात्रा और सुदृढ़ीकरण की बजाये गाडिय़ों की खरीद को तरजीह दी गयी. दिये गये अनुदान के समय यह स्पष्टï निर्देश दे दिया गया था कि इन मदों के अलावे किसी अन्य मद में आवंटन को डायवर्ट नहीं किया जाए बावजूद इसके वह सब हुआ. योजना उदïदेश्य शिक्षण और प्रायोगिक वर्गों का मौजूदा सुविधाओं का उत्थान और चालू सिविल कार्य को पूरा करना था.2.27 करोड़ में से 28.25 लाख रूपये छात्रावासों एवं शैक्षणिक भवनों के पुनरूत्थान पर, तीन लाख केन्द्रीय पुस्तकालय और महाविद्यालय के पुस्तकालयों के पुस्तकालयी पुस्तकों पर 193.75 लाख पुनरावृति व्यय जिसमें पाठय पुस्तक, प्रायोगिक मेनुअल, यूजी एवं पी.जी प्रायोगिक आकस्मिकताओं, कम्प्यूटर लैव , सेमिनार,कार्यशाला इत्यादि की तैयारी और दो लाख राष्टïीय छात्रवृति पर खर्च किये गये. इस अनुदान से नये औजारों की खरीद और नये सिविल कार्यों का सम्पादन प्रतिबंधित था बावजूद इसके वाहनों की खरीद कर ली गयी गयी. कैग ने इस पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की है और सरकार से रिपोर्ट तलब की है पर सरकारी स्तर पर संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका है.

रोती हुई सड़कें छोड़ वो गये

शमशादपटना : आये भी गये, गये भी वो, खत्म फसाना हो गया. जी हां सड़क निर्माण विभाग के प्रधान सचिव आरके सिंह जी केंद्रीय प्रति नियुक्ति पर चले तो गये. पर अपने पीछे छोड़ गये रोती सड़कें, जो निर्माण के बाद से ही तत्काल मरम्मत मांगने लगी हैं. इस विभाग ने तमाम नियम कायदों को ताक पर रखकर सुशासन में सड़क निर्माण की गति तो जरूर तेज दिखायी. पर, निमार्ण कार्य के दौरान सरकारी धन की लूट में भी जमकर वृद्घि की. सीएजी की रिपोर्ट भी साफ साफ इस ओर इशारा करती है. कई जिलों के सड़क निर्माण कार्य की समीक्षा करने से यह स्पष्टï भी हो गया है. उदाहरण के लिये ग्रामीण कार्य प्रमंडल सीतामढ़ी द्वारा कराये गये कार्यों को देखा जाए तो इससे स्पष्टï हो जायेगा कि अधिकारी किस सफाई से संवेदकों की सांठ-गांठ से सरकारी राजस्व को दोनों हाथों से लूट रहे हंै. यह तभी संभव है जब संवेदक और अधिकारी की सांठगाठ हो. ग्रामीण कार्य प्रमंडल सीतामढ़ी अंतर्गत मुटलिया चक डुमरा के 3.68 किमी सड़क के चौड़ीकरण एवं मजबूतीकरण का कार्य एक संवेदक को 89 लाख रुपये के प्राक्कलित मूल्य पर दिया गया. जिसका एकरारनामा मार्च 2006 में हुआ इसके अनुसार सितम्बर 2006 में इसे पूरा किया जाना था. कार्य नियत तिथि के अंदर पूरा किया भी गया और 87.32 लाख रुपये की राशि संवेदक को जुलाई 2007 में भुगतान कर दी गयी. इन अभिलेखों की जांच 2008 में हुई, इससे प्रकट हुआ कि प्राक्कलन के अनुसार स्टोन मेटल व चिप्स के लिए 215 किमी दूर शेखपुरा से प्रावधान किया. गया. सहायक खनन पदाधिकारी शेखपुरा के द्वारा जनवरी 2007 में प्रमाण पत्र निर्गत किया गया. पर जांच में प्रमाण पत्र नकली निकला. इस प्रकार कार्य में उपयोग किये गये 3086.81 घन मीटर स्टोन चिप्स के विरूद्घ 2.11 लाख रुपये की रायल्टी की छूट संवेदक द्वारा ली गई. चूंकि शेखपुरा खदान से स्टोन चिप्स प्राप्ति के विरूद्घ निर्गत रायल्टी छूट, प्रमाण पत्र नकली था इसलिए स्टोन मेटल, चिप्स का उपयोग भी संदेहास्पद था, परंतु इन पहलुओं को अंदेखा कर प्रमंडल के अधिकारियों ने निर्दिष्टï खदान से प्राप्ति की वास्तविकता सुनिश्चित किये बिना ही 87.32 लाख रुपये के चौथा चालू लेखा विपत्र ढुलाई के मूल्य सहित का भुगतान कर दिया गया. कैग ने इस पर गंभीर आपति व्यक्त की है तथा सरकार से स्थिति स्पष्टï करने को कहा है. ऐसे ही कार्य लखीसराय जिले में हुए जहां शेखपुरा से चिप्स को ढोये गये पर संवेदक को मिर्जापुर क्वेरी से स्टोन ढ़ोने का भुगतान कर दिया गया.

बुधवार, 24 जून 2009

माँ नही रही

माँ नही रही पिछले ९ जून 2009 को उनका निधन हो गया,मैं उनके पास उस समय नही था यह मेरे लिए दुखद था जिसके लिए मैं जीवन भर ख़ुद को माफ़ नही कर सकूँगा।
शमशाद आलम

शुक्रवार, 19 जून 2009

यह ब्लॉग बिहार की राजनीतिक, शैक्षणिक, समाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से दुनिया को रु-ब-रु करायेगा.

लोग जिन हादसों में मरते हैं
मुझको उन हादसों ने पाला है
शमशाद


गुरुवार, 18 जून 2009

विकास के बाद अब धन्यवाद यात्रा

शमशादपटना : विकास यात्रा के दूसरे फेज के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धन्यवाद यात्रा पर 17 जून से विधिवत निकल चुके हैं पर दूसरे फेज की विकास यात्रा भी तो धन्यवाद यात्रा का ही अभ्यास था. ऐसा डेहरी में दिये उनके वक्तव्य से लगता भी है. अब यह धन्यवाद यात्रा है या फिर विधानसभा उपचुनाव की तैयारी यह बहस का मुद्दा नहीं है, बात यह है कि इसी बहाने वे तक अपनी बातें पहुंचाने में सफल तो हो रहे है. डेहरी आन सोन की सभा में मुख्यमंत्री ने अपने द्वारा मांगी गयी मजूरी और फिर किए गए काम को काफी प्रमुखता से रखा. कहा-हम चुनाव के समय आपसे अपनी मजदूरी मांगने आये थे. आपने हमें भरपूर मजदूरी दी. धन्यवाद आपका. और हां काम भी हम खूब कर रहे है. पहले जो वादा किया था उसे बखूबी निभाया. लोकसभा चुनाव के समय वादा किया था कि डेहरी में डेयरी प्लांट और फिर डालमियानगर में पालिटेकनिक खुलेगा. इन सब के लिए पैसे की व्यवस्था की. उन्हे आवंटित किया. जगह की व्यवस्था हुई और आज शिलान्यास किया. जो वादा किया वह निभाया. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री चुनाव में जीतने के बाद जनता के बीच जाकर उन्हें धन्यवाद दे रहा हो. इस बार वे उन जिलों में जा रहे हैं जहां पिछली बार नहीं गये थे. अपनी सभाओं में वे लोगों की समस्याओं को सुन रहे हैं और उसके समाधान का आश्वासन दे रहे हैं. पूर्व में किये वायदों के पूरा नहीं होने की याद दिलाने पर वे जनता को फिर से आश्वासन की घुटटी पिला रहे हैं. जिन कामों को कर चुके हैं उनके बारे में तो मंच से ही लोगों को कर्ज उतारने की बात कह उन पर ऐहसान जताने का प्रयास कर रहे हैं कि वे वादे निभाने के लिए करते हैं. उनकी सभाओं में इस बार एक बात खास तौर पर देखने को यह मिल रहा है कि वे लालू-रामविलास को निषाना बनाने की बजाये केन्द्र की कांग्रेस सरकार पर प्रहार कर रहे हैं. बिजली की खराब स्थिति के सवाल पर लोगों के उठाये गये सवाल से लेकर अनाज वितरण का क्रम टूटने तक के लिए वे केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. साथ ही राज्य को विषेष राज्य का दर्जा दिलाने की अपनी मुहिम में लोगों से शामिल होने का आह्वान भी करते नजर आ रहे हैं. वजह साफ है.आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में वे अभी से जुट गये हैं. 17 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव व 24 निकाय विधान पार्षदों का चुनाव सिर पर अलग है इसलिए वे विरोधियों को कोई मौका नहीं देना चाहते ताकि वे उन पर वार कर सकें. कारण इन सीटों में से अधिकतर राजग की ही सीटें हैं जिसे फिर से जीत लाने का उनपर दबाव रहेगा अन्यथा मैसेज खराब जा सकता है. फतुहा विधानसभा उपचुनाव में सरकार को अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ी तब कहीं लोजपा उम्मीदवार हारा. फतुहा सीट पर जदयू का ही कब्जा था उपचुनाव में पुन: सीट निकाल लेने से राजग खेमे में संतोष है. उधर विपक्षी दल राजद-लोजपा अपने हतोत्साहित कार्यकर्ताओं को चार्ज करने की मुहिम तेज कर दी है. उनके सामने दल में आयी भगदर को रोकने की चुनौती है. लोजपा और राजद में मलाईदार पदों पर रहने वाले कई नेता पाला बदलकर अब जदयू की तैयार छाछ पीने पहुंच रहे हैं. इससे पुराने कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ी है कारण साधन सम्पन्न ये नेता तो इन्हीं की न हक मारी करेंगे. इनमें से कई तो मक्खनबाजी में महारत रखते हैं.