शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

इस तरह कट रहा हमारा डॉल्फिन

मो.शमशाद आलम
: गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित कर दिये जाने से इस जीव के विलुप्त होने के खतरे पर अब शायद अंकुश लग जाए. पर सिर्फ घोषणा मात्र से इसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि यह जीव अपनी मौत नहीं मर रहा बल्कि उन्हें उंची कीमत के लोभ में गंगा की तटों पर बसे लोग व मछुआरे मार रहे हैं. आज भी मुंगेर, सुल्तानगंज एवं भागलपुर के बाजार में गंगा डॉल्फिन की चर्बी पांच सौ रूपये प्रति किलो की दर से खुलेआम बेची जा रही है. 5 अक्तूवर के बाद से हालांकि स्थिति कुछ बदली है. 6 अक्तूवर तक सभी समाचार पत्रों में गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जीव घोषित किये जाने की खबर को पढऩे के बाद इस जीव को गंगा नदी में मारकर खुलेआम बेचने वाले लोग चौकन्ना हो गये हैं. बिहार के, मुंगेर, सुल्तानगंज के आसपास गंगा नदी में गंगा डाल्फिन पायी जाती हें. गंगा के तटीय इलाके के लोग इसे सोंस के नाम से जानते हैं. एक सर्वे के मुताबिक गंगा नदी में अब सिर्फ 700 से 800 डाल्फिन शेष रह गयी हैं. जिस तेजी से इस जीव का मारा जा रहा है इसे नहीं बचाया गया तो यह विलुप्त हो ही जाता. इसे देखते हुए इसे सही समय पर राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है. अब इसे मारने वाले के साथ-साथ इसका अन्य रूप में उपयोग करने वाले भी दंडित होंगे. पर इसके लिए सरकारी तंत्र को ईमानदार पहल करनी पड़ेगी, क्योंकि गंगा डाल्फिन की चर्बी का उपयोग मछुआरे बचवा मछली पकडऩे में चारे के रूप में प्रयोग करते हैं.ऐसे में राष्टï्रीय पक्षी मोर और राष्टï्रीय पशु बाघ की रक्षा की तुलना में इस जीव की सुरक्षा काफी कठिन होगी. जिसके लिए अलग से टास्क फोर्स बनाकर ही इस जीव की रक्षा संभव है अन्यथा इसका अवैध शिकार निरंतर जारी रहेगा और एक दिन चीन की ही तरह यहां से भी यह विलुप्त हो जायेगा. इसलिये इस जीव को विलुप्त होने से बचाने का एक ही उपाय है, कि मछूआरों और गंगा के तटीय क्षेत्र में बसे लोगों को इस जीव के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए साथ ही उनके बीच इस बात को भी प्रचारित कराया जाए कि सोंस को गंगा की सवारी माना जाता है, जिसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है.इस बात के प्रचारित होने से धर्म प्रेमी सज्जन इसे मारने से बचेंगे साथ में लोगों को भी इससे रोकेंगे.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें