गुरुवार, 19 अगस्त 2010

जमालपुर सीट पर लोजपा की दावेदारी

जमालपुर विधानसभा क्षेत्र को लोजपा अपनी सूची में जोड़े हुए है, गत विधानसभा चुनाव में यहां से जदयुू के उम्मीदवार षैलेष कुमार जीते थे। वे कुर्मी जाति से हैं और अपने ही स्वजातीय राजद के उम्मीदवार उपेन्द्र प्रसाद वर्मा को मात दिया था। पर नये परिसीमन में इस विधानसभा क्षेत्र में राजपूत मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक हो गई है। इसलिए लोजपा यहां से किसी राजपूत नेता को टिकट देने का मन बना रही है जबकि जदयू षैलेष कुमार को उम्मीदवार बनायेगा।
इस विधानसभा क्षेत्र से राजद के उम्मीदवार उपेन्द्र प्रसाद षर्मा थे, पर पिछली दफा यादव मतदाताओं ने उन्हे मत न देकर जदयू उम्मीदवार षैलेष कुमार को समर्थन दे दिया था। इसके पीछे कारण पूर्व मंत्री जयप्रकाष नारायण यादव व उपेन्द्र प्रसाद वर्मा से यादव वोटरों की नाराजगी थी। इस बार भी कुल मिलकर स्थिति वैसी ही है पर उपेन्द्र प्रसाद वर्मा अब राजद छोड़ जदयू में जा चुके हंै । ऐसे में राजद के पास जमालपुर से लड़ने के लिए कोई कद्दावर नेता नहीं है जो इस सीट को निकाल सके। वैसे भी जयप्रकाष नारायण यादव की यादव मतदाताओं पर से पकड़ ढ़ीली पड़ गई है जबकि इस विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी ,कोइरी मतदाताओं की संख्या कम हुई है। यही कारण है कि राजपूत जाति के उम्मीदवार जोर आजमाइष कर रहे हैं ,वैसे राजपुत उम्मीदवार हुआ तो,यादव ,पासवान, और मुसलमानों का समर्थन पाकर यहां लोजपा -राजद गठन्ंधन आसानी से जीत दर्ज करा सकता है। वैसे इस पर राजद भी अपना दावा ठोके हुए है पर मुंगेर और तारापुर विधानसभा सीट पर राजद का कब्जा है ऐसे में लोजपा जमालपुर सीट पर ही दावा ठोंक सकती है । इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग बीस हजार पासवान मतदाता भी हेै । पूर्व में इस विधानसभा क्षेत्र से लोजपा ने यादव जाति की साधना देवी को दो बार चुनाव मैदान में उतारा था पर वे दोनो बार फाइट में भी नहीं आ सकी यही कारण है कि इस बार लोजपा यहां से उम्मीदवार बदल सकती है। राजपूत जाति के बीडीओ सिंह हाल में भाजपा से त्याग पत्र देकर लोजपा में षामिल हुए है और लोजपा की टिकट के लिए लाविंग भी कर रहे है । ऐसे में लोजपा राजद उम्मीदवार को कड़ी चुनौती पेष करने के लिए राजपूत जाति से उम्मीदवार उतार सकती है। इसके पीछे की गणित, राजपूत ,यादव, पासवान अैार मुसलमान मतदाताओं का ध्रुवीकरण कराकर किसी प्रकार सीट को निकल ले जाने की है। इस विधानसभा क्ष्ेात्र से अरविन्द कुमार राय, भी अपनी दावेदारी बनाये हुए हैं जबकि राजद यहां से चुनाव में उतरी तो नरेष सिंह यादव की मजबूत दावेदारी है। इनके अलावे युवा राजद के जिलाध्यक्ष प्रमोद कुमार यादव, मंटू यादव भी टिकट की दौर में हैं। कांग्रेस भी यहां से अपनी दावेदारी ठेंकेगी। कांग्रेस खेमे से तारकेष्वर यादव, प्रो.सुमन और सुषमा देवी के नामों की चर्चा है जबकि प्रदेष स्तर के एक कांग्रेसी नेता के भी यहां से चुनाव मैदान में कूदने की बात सरगर्मी से हो रही है।
उधर तारापुर विधानसभा सीट पर इस चुनाव में राजद की टिकट पर वहां के विधायक षकुनी चैधरी एक बार फिर से अपनी किस्मत आजमायेंगे जबकि उन्हें टक्कर के लिए जदयू खड़गपुर के विधायक अनन्त कुमार सत्यार्थी को उतार सकती है पर वे षकुनी चैधरी को कड़ी टक्कर देने में षायद ही सफल हो सकें क्योंकि उन्हें टिकट दिया गया तो जदयू की पुरानी लावी उनको हराने के लिए षकुनी चैधरी के पक्ष में गोलबन्द हो सकती है। वैसे भी इस क्षेत्र में कुषवाहा और यादव मतदाताओं के बीच छत्तीस का रिष्ता रहा है ऐसे में अनन्त सत्यार्थी जदयू के उम्मीदवार हुए तो उन्हें स्वजातीय होने कके नाते यादव मतदाताओं का तो समर्थन मिल सकता है पर वे कुषवाहा व कुर्मी मतदाताओं का मत प्राप्त करने में असफल रहेंगे। जिसका लाभ षकुनी चैधरी जिनकी पैठ सभी जाति वर्ग के मतदाताओं में है। यहां से जदयू की टिकट पर गत चुनाव में राजीव कुमार सिंह ने ष्षकुनी चैधरी को कड़ी टक्कर दी थी और मात्र छह सौ मतों से चुनाव हारे थे। इस बार भी यहां से अपनी दावेदारी ठोंके हुए हैं। कांग्रेस से जिला कांग्रेस अध्यक्ष अरूण कुमार यादव का टिकट इस बार लगभग तय माना जा रहा है और उनकी क्षेत्र में पकड़ का लाभ भी मिल सकता है क्योंकि खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र से नये परिसीमन में यादव मतदाताओं की बड़ी संख्या तारापुर विधानसभा में जुड़ी है। ऐसे में देखना यह है कि तारापुर में सयासत के माहिर षकुनी चैधरी अपना किला बचा पाते हैं या नहीं।

मुंगेर जिले की तीनों सीटों पर होगा कांटे का संघर्ष

मुंगेरः मुगेर जिला के तीन विधानसभा क्षेेत्रों में दो पर राजद और सीट अभी जदयू.के कब्जे में है।बिहार विधानसभा चुनाव 2010 के बिगुल फूंके जाने के साथ मुंगेर विधानसभा क्षेत्र का चुनावी परिदृष्य लगातार साफ होने लगा है। चुनाव नये परिसीमन पर होना है। 1995 के चुनाव तक मुंगेर विधानसभा क्षेत्र कांगे्रस का मजबूत गढ़ हुआ करता था। इसके बाद अन्य दलों ने कब्जा जमाया। तब इस विधानसभा क्षेत्र में मुंगेर नगर परिड्ढद,सदर प्रखण्ड और जमालपुर की चार पंचायतों बांक,इन्द्ररूख पूर्वी,पष्चिमी एवं
नया रामनगर पंचायत हुआ करता था लेकिन नये परिसीमन में इस क्षेत्र का भुगोल ही बदल गया और अब इस क्षेत्र में मुगेर नगर सदर प्रखण्ड की सभी पंचायतों ,मुंगेर नगर निगम का इलाका एवं बरियारपुर प्रखण्ड की ग्यारह पंचायतों को षामिल किया गया है। इस तरह अब इस क्षेत्र में मतदाताओ की कुल संख्या 272796 जिसमें पुरूड्ढ-151706 और महिला -121090 है। बढ़ती महिलाओ की जागरूकता से आगामी चुनाव में मतदान की भूमिका अहम होगी। यह क्षेत्र गंगा नदी के तट पर अवस्थित है। इस क्षेत्र का ऐतिहासिक ,पुरातात्विक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्व है। मुंगेर को कभी अंग और मगध की राजधानी बनने का सौभाग्य प्राप्त था। योग विद्यालय के कारण मुंगेर योग नगरी के नाम से ख्यात है। कल कारखनों की दृष्टि से पहला बन्दूक अैार सिगरेट कारखाना यहीं स्थापित है। दियारा की भूमि काफी उपजाऊ है। यहां का मुख्य फसल-गेहूं,खंढ़ी, दलहन,-तेलहन एवं धान है, किन्तु किसानो को अपेक्षित सरकारी मदद का अभाव है। नौवागढ़ी को प्रखण्ड का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर यदा-कदा आन्दोलन होता रहा है। यद्यपि नौवागढ़ी नक्सल प्रभावित क्षेत्र माना जाता है । मुंगेर में अवैध हाथियार निर्माण का धंधा खुब फल-फूल रहा है । इस क्षेत्र का चहुंमुखी विकास अब तक यथोचित सम्भव नहीं हो पाया है। विधुत आपुर्ति की व्यस्था चरमरायी हुई है। मुंगेर नगर निगम ,सदर प्रखण्ड और बरियारपुर में पेयजल की समस्या भयावह है। मुंगेर नगर निगम में तो पिछले आठ वड्र्ढो से जलपूर्ति व्यवस्था ठप है । क्षेत्र के लोगों का मुख्य पेषा नौकरी ,व्यवसाय और खेती है। सदर प्रखण्ड का दियारा क्षेत्र प्रत्येक वड्र्ढ बाढ़ और कटाव से प्रभावित होता रहा है। बरियारपुर में कटाव पीड़ितोें के सामने पुर्नवास की समस्या ज्यों की त्यों बरकरार है। इस क्षेत्र में नगर निगम क्षेत्र के 70 प्रतिषत लोग एलपीजी का इस्तेमाल करते है किन्तु, सदर प्रखण्ड और बरियारपुर में एलपीजी के प्रयोग का औसत कम है। मुंगेर विधान सभा क्षेत्र की कुल आबादी 390147 जिसमें अनुसचि जाति 9.68 प्रतिषत ,अनुसूचित जनजाति 0.27 प्रतिषत ,मुसलमान 12.64 प्रतिषत तथा साक्षरता दर 61 प्रतिषत है।
1995 के चुनाव में डा. मोनाजिर हसन राजद की टिकट पर जीते । इसके बाद से लगातार उन्हीं का कब्जा रहा है। वे मंत्री बने इस दौरान डा. हसन राजद को छोड जदयू में षामिल हुए । 2009 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय संसदीय क्षेत्र से उनके सांसद बनने पर मुंगेर में इसी वड्र्ढ उपचुनाव हुआ । इस उपचुनाव में राजद प्रत्याषी विष्वनाथ प्रसाद गुप्ता ने जदयू के प्रत्याषी मो.सलाम को 4151 मतों से पराजित किया। मुंगेर के राजद विधायक विष्वनाथ प्रसाद गुप्ता अपने सीमित क्षेत्र की जनता के दिलों में गहरी छाप छोड़ी है। उनकी टिकट छीनने के लिए राजद के भीतर सुगबुगाहट तेज है। इस पार्टी से टिकट के दावेदारी में वरिष्ठ राजद नेता अरविन्द चैरसिया,मंुगेर नगर निगम के उपमुख्य पाड्र्ढद सुनील राय, पार्टी महासचिव संजय पासवान, प्रो..अनिल भूड्ढण ,परवेज चांद,वार्ड आयुक्त मनोज गुप्ता एवं रणजीत गुप्ता आदि के नामों की चर्चा है। मंुगेर से लोजपा के उम्मीदवारी की दौर में क्रमषः बी.डी.ओ.सिंह, मो. जुवैर आलम उफ्र्र फूल, संजय यादव एवं लोपजा के प्रदेष महासचिव सह प्रवक्ता राकेष कुमार मंडल के नामों की चर्चा है। सत्तारूढ़ राजग गठबंधन के जदयू में भी टिकटार्थियों की लम्बी सूची में है। जदयुू से मो. सलाम, मो. मुस्ताक खां, ज्ञानचन्द पटेल तथा डा. हसन की धर्मपत्नी एवं जिला जमीउत राइन के मुख्य संरक्षक मो. इस्लाम के नामों का उल्लेख है। राजग गठबन्धन भाजपा भी चुनाव मैदान में मुंगेर उवं जमालपुर क्षेत्र से टिकट पाने की दौर एवं दावे में है। भाजपा से मुंगेर नगर अध्यक्ष राजेष जैन एवं प्रो. अजफर षमसी भी मंुगेर विधानसभा क्षेत्र के लिए टिकट पाने हेतु पार्टी में दबाव बनाने में लगे हुए है। इधर समाजवादी पीर्टी के जिला अध्यक्ष पप्पु यादव भी चुनाव मैदान में उतरने के लिए तत्पर है। यदि कांगे्रसी खेमे की तरफ निगाह करते हैं तो कांगे्रस अपनी खेयी जमीन हासिल करने के लिए कोइ कसर छोड़ना नहीं चाहती। कांगे्रस का टिकट पाने के लिए जोर लगाने वालो में पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी.पी.यादव, मो. षहजाद, पूर्व जिलाध्यक्ष वासुदेव साह, जिलाध्यक्ष अरूण कुमार यादव, प्रभात कुमार मिश्र, फिल्म निर्देषक प्रीतम सिंह, इनामुल हक,प्रो. देवराज सुमन एवं मो.जावेद गनी के नामों की चर्चा जोरों पर है। अब तो वक्त ही बताएगा कि आने वाले दिनों में कौेन-कौन लोग अपनी-अपनी पार्टी से टिकट पाने में सफल होते हैं और चुनावी राजनीतिक का इतिहास रचने में सफल होते है।

ऐसे हुई नीतिश सरकार में लूट

शमशाद आलम
पटना: बिहार की राजनीति में घोटाले का बड़ा रोल रहा है। चारा घोटाला को उजागर कर राज्य की शासन पर कब्जा करने वाले नीतीश कुमार की राजग सरकार से कभी किसी ने यह उम्मीद नहीं किया होगा कि इस सरकार पर भी वैसे ही आरोप लग जायेंगे जैसा कि लालू यादव की सरकार पर लगे थे। इस और उस सरकार में फर्क सिर्फ इतना भर का है कि उस सरकार ने मवेशी के चारे को स्कूटर पर ढ़ोया था और इस सरकार के कारिन्दों ने स्कूटर व मोटरसाइकिल से बाढ़ राहत के अनाज के बोरे को ढ़ो दिया। सरकार ने हाल में ट्रेजरी घोटाले को यह कहते हुए अपनी सफाई पेश की है कि यह एसी-डीसी बिल का मामला है न कि यह कोई घोटाला है। पर सरकार की जिम्मेदारी क्या इस बात के लिए नहीं है कि वह यह देखे कि उसके कारिन्दे व अधिकारी कैसा काम कर रहे हैं। सरकार ने गुड गवर्नेंस का दावा किया था पर क्या सरकार का गुड गवर्नेंस यही है कि पिछले पांच सालों से उसके अधिकारी एडवांस लिये गये राशि का हिसाब नहीं पेश कर सके?। मुख्यमंत्री तब कहां थे जब उन्हें इस बारे में कैग ने इत्तला किया था? क्या यह लापरवाही नहीं है कि सरकार यह जानते हुए भी कि क्या गलत हो रहा है उस पर रोक लगाने की बजाये उसे यूं ही सब होने के लिए छोड़ दिया गया? इस मामले की जांच सीबीआई से कराने के कोर्ट के आदेश के बाद जिस प्रकार सरकार ने अपने अधिकारियों के जरीये डीसी बिलों को जमा करवाया क्या वह सरकार के काम-काज के तरीकों पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा करती है? टेजरी घोटाले को तो सरकार ने एसी व डीसी बिल का मामला बता दिया पर बाढ़ राहत के बोरे को स्कूटर पर ढ़ोने को वे क्या बतायेंगे। कैग ने अपनी जांच में यह भी पाया कि एक ही महिला दो माह में पांच बार गर्भवती बताकर सरकारी राशि की निकासी कर ली गयी। ऐसे एक दो नहीं बल्कि 298 मामले पकड़ में आये हैं। इसके बचाव का सरकार क्या तर्क पेश करेगी? क्या यह उस सरकार के लिए शर्म की बात नहीं है जिस सरकार ने ऐसे ही घोटाले को उजागर करके अपना साख जनता के बीच बनायी थी।
अब ट्रेजरी घोटाले को ही लें। इसे सरसरी निगाह से देखने से यह लगता है कि योजना मद में जितनी राशि निकाली गयी उसका पता नहीं चल रहा कि उसका क्या हुआ? कितने रूपये योजना मद में खर्च हुए और कितना शेष रह गये? पूरे मामले को कैग ने गंभीरता से लिया और सरकार से अपनी आपत्ति व्यक्त कर रही थी पर सरकार कैग के ऐतराज को हवा में उड़ाती रही। इसी बीच एक अधिवक्ता ने कैग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पटना उच्च न्यायालय में 11,412 करोड़ के घोटाले का आरोप लगा कर रिट दायर कर दिया। जिस पर सरकार से पक्ष रखने को कहा गया तब सरकार ने साफ कह दिया कि कोई घोटाला नहीं हुआ है। तब उच्च न्यायालय ने पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने का मन बना लिया और सीबीआई के निदेशक व उपनिदेशक को 26 जुलाई को न्यायालय में उपस्थित रहने का आदेश जारी कर दिया। उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद सरकार का हाथ पांव फुलने लग गया क्योंकि विपक्षी दल के नेता सरकार से इस्तीफे की मांग करने लगे। इस मामले में अपना गर्दन फंसता देख मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकार के अन्य मंत्रियों और सहयोगी दल भाजपा के साथ मंत्रणा प्रारम्भ कर दी और आनन फानन में जिले के अधिकारियों को डीसी बिल जमा करने का निर्देश दिया साथ ही सीबीआई जांच से बचने के लिए पटना उच्च न्यायालय में न्यायालय के आदेश के खिलाफ पुर्नविचार याचिका दायर करवाया। जिस पर न्यायालय ने तत्काल अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए पूरे प्रकरण की जांच के लिए 26 जुलाई को बुलाये गये सीबीआई निदेशक व उपनिदेशक को उच्च न्यायालय आने से तत्काल रोक दिया। न्यायालय के इस निर्णय से सरकार को तत्काल राहत जरूर मिल गयी है पर इससे सरकार अभी पूरी तरह उबर नहीं पायी है यह सही है कि जांच सीबीआई को सुपूर्द कर दिये जाने के उपरान्त सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती थी। उधर विपक्ष इस मामले को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान जम कर हंगामा किया और सरकार पर घोटाले का आरोप लगाते हुए सरकार के मुखिया नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग की थी। पूरे प्रकरण को देखने से एक बात तो यह साफ हो गया है कि भले ही नीतीश कुमार पारदर्शी शासन या सुशासन का दावा करें पर उनका कार्यकाल भी लचर पचर तरीके से ही चला। सात सालों से योजना मद में निकाली गयी राशि का हिसाब नहीं प्रस्तुत करना तो यही दर्शाता है कि राज्य में सरकार भागवान भरोसे ही चल रही थी। जहां अधिकारियों को मनमानी की पूरी छूट रही। ऐसे में पिछली सरकार और सुशासन की इस सरकार में क्या फर्क रह गया है। लूट की छूट तब भी थी और इस सरकार में भी अधिकारियों ने जमकर मनमानी की। सीएजी 08-09 की रिपोर्ट जिसमें 31 मार्च 2009 तक की रिपोर्ट पेश की गयी है उसमें तो इस बात का भी खुलासा किया गया है कि खगड़िया जिले में बाढ़ राहत के अनाज को स्कूटर व मोटरसाईकिल पर ढ़ो दिया गया। इतना ही नहीं दो माह में एक ही महिला के नाम पर पांच बार जननी योजना की राशि की निकासी कर ली गयी। ऐसे एक दो नहीं 298 मामले पकड़ में आये हैं। यह क्या है?क्या इसे घोटाला नहीं कहा जायेगा?सरकार ने अब तक उनलोगों के खिलाफ क्यों कार्रवायी नहीं की जिन्होंने ऐसे मामलों को अंजाम दिया? तो क्या ऐसे लोगों को सरकार का संरक्षण प्राप्त होना नहीं मान लिया जाए?
वह भी उस स्थिति में जब कैग ने पूरे मामले से राज्य सरकार को अवगत करा दिया था।
बहरहाल बिहार की जनता भी अब इस घोटाले का मतलब जान चुकी है। लोग चैक-चैराहों पर चर्चा करते देखे जा रहे हैं कि नीतीश तो लालू से भी आगे निकल गये। यानि जितने मूंह उतनी बातें।
कैग ने अपनी 2008-09 की रिपोर्ट में कई विभागों में अनियमितता को उजागर कर नीतीश सरकार के काम काज के पारदर्शी होने के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। कई विभागों में उलटफेर सामने आये हैं। इनमें से कुछ अनियमितताओं को आप स्वयं देखें और यह निर्णय लें कि क्या सरकार का स्वच्छ सरकार का दावा सही है? या फिर यह सरकार उन सरकारों से भी ज्यादा विफल रही जिन सरकारों पर विफल होने का आरोप लगाया जाता रहा, और अधिकारी,राजनेता गठजोड़ ने जनता के नाम से और जनता के लिए आये धन को दोनों हाथों से लूटा।
मुख्यमंत्री आवास योजना का कार्यान्वयन
वर्ष 2007 के दौरान बाढ़ से प्रभावित 22 जिलों के उनलोगों को जिनके कच्चे घर और झोपड़ियां पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। पक्का घर देकर पूर्नर्वासित करने के लिये राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री आवास योजना की शुरूआत की थी। योजना मार्च 2009 तक पूरा किया जाना था। योजना के दिशा निर्देशों में लाभान्वितों की पहचान के लिए विहित मानकों में लाभान्वित का नाम, पिता व पति का नाम ,उनका स्थायी पता भूखण्ड की चैदही और घरों के क्षतिग्रस्त होने की तिथि के साथ कच्चे घरों/झोपड़ियों की स्थिति का उल्लेख करते हुए लाभान्वितों की सूची बनानी थी। इसे घर-घर जाकर सर्वेक्षण कर डिजिटल फोटोग्र्राफी व तिथि के साथ लाभान्वितों की सूची को अन्तिम रूप देते हुए सम्बन्धित जिलाघिकारी द्वारा 4 मार्च 2008 तक पूरा कर लिया जाना था। विभाग द्वारा सम्बन्धित जिलाघिकारियों को , योजना के अंतर्गत पहचान किये गये लाभन्वितों की संख्या के आघार पर प्रगति सूचित करने और उपयोगिता प्रमाण पत्र समर्पित करने के अनुदेशों के साथ निघि का आवंटन भी किया गया था,तथापि साल 2007-09 के दौरान 4.64 लाख चयनित लाभान्वितों और 1070.83 करोड़ रूपये के आवंटन के विरूद्व केवल 1.51 लाख लाभान्वितों को ही 363.19 करोड़ रूपये दिये गये थे। इसमें से मात्र 11249 घरों में शत-प्रतिशत को अगस्त 2009 तक पूरा किया गया।
नमूना जांचित छह जिलों के 20 प्रखंडों में 11257 चयनित लाभान्वितों में से 3131 लाभान्वितों के चयन में जिलाघिकारियों द्वारा योजना के चयन प्रगति मानकों का अनुपालन नहीं किया गया था।
मोतिहारी सदर अंचल में चयनित 651 लाभन्चितों में से 138 लाभन्वितों को डिजिटल फोटोग्राफ की अनुपलब्घता के कारण सहायता से वंचित रखा गया। इसके अतिरिक्त 93 लाभान्वितों को , किसी अन्य आवास सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत लाभ का उपभोग किये जाने के प्रति सत्यापन के अभाव में लाभ नहीं दिया गया।
वर्ष 2008-09 के दौरान आठ जिलों ंके 74 प्रखंडों में 50,025 लाभार्थियों को जून 2008 की निर्घारित तिथि तक निर्माण पूर्ण करने हेतु 120.38 करोड रूपये वितरित अप्रील 2008 से मार्च तक किये गये थें। उसमें से केवल 6,534 घरों 13 प्रतिशत का निर्माण सम्पूर्ण रूप से किया गया था। जुलाई 2009 मंे पूर्णिया सीतामढ़ी आदि जिलों में जून 2009 तक एक भी घर का निर्माण पूरा नहीं किया गया था।

क्षतिग्रस्त मकानों के लिए सहायता का अघिक भुगतान

सहरसा जिले के दो अंचलों में वर्ष 2008 के बाढ़ की अवधि में पूर्ण तथा क्षतिग्रस्त 4642 झोपड़ियों का सर्वेक्षण जनवरी 2009 में किया गया था और सी.आर.एफ. के प्रतिमानकों के अनुसार उन्हें 200 रूपये ंकी दर पर सहायता प्रदान किये जाने की श्रेणी में रखा गया किन्तु जिलाघिकारी के आदेश मई 2009 में उन झोपड़ियों की श्रेणी को पूर्णतया क्षतिग्रस्त कच्चे घरों के रूप में बदल दिया जिसके लिए 10,000 रूपयें की दर पर सहायता का भुुगतान किया गया। इसके फलस्वरूप 3.72 करोड़ रूपये का अघिक भुगतान हुआ। सम्बन्घित अंचल अधिकारी ने बताया कि अगस्त 2009 के आपदा प्रबन्घन विभाग के प्रघान सचिव द्वारा जनवरी 2009 में आयोजित वीडीओं कांफ्रेंसिंग में दिए गये अनुदेशों के अनुसार ऐसा किया गया।
सोनबरसा प्रखंड में आंशिक क्षतिग्रस्त 1633 कच्चे घरों और आंशिक क्षतिग्रस्त 111 पक्के घरों के लिए 1500 रूपये प्रति घर के बदले 10,000 रूपये प्रति घर की दर से और 224 क्षतिग्रस्त झोपड़ियों के विरूद्व भुगतान किया गया जिसके कारण 1.66 करोड़ का अघिक भुगतान हुआ।
कृषि निवेश सहायिकी को अनियमित एवं अधिक भुगतान
धोड़ासाहन प्रखंड पूर्वी चंपारण में 142.40 हेक्टेयर Õतिग्रस्त फसल की रिपोर्ट थी किन्तु कृषि निवेश सहायिकी के रूप में 2178.64 हेक्टेयर के लिये 5368 लाभार्थियों के बीच 67.81 लाख रूपये का वितरण किया गया। इस प्रकार, 10.75 लाख का अधिक भुगतान किया गया।
मानव संसाधन प्रबन्धन
आपदा प्रबन्धन विभाग के अभिलेखों की संवीÕा से उद्घटित हुआ कि विभाग के शीर्षस्थ पदाधिकारियों प्रधान सचिव विशेष सचिव अपर आयुक्त का प्रभार अन्य विभागों के पदाधिकारियों द्वारा अतिरिक्त प्रभारों के रूप में आधारित था। दरभंगा, पटना, सहरसा और सीतामढ़ी जिलों में विभाग के जिला स्तर के कार्यालयों का प्रबन्धन न्यूनतम कर्मचारियों द्वारा किया जा रहा था। साथ ही मुख्यालय में पदाधिकारियों और कर्मचारियों का अभाव था जिससे राज्य नियंत्रण कÕ के परिचालन तथा आपदा की स्थिति में अनुवीÕण को प्रभावित किया था।
जल संसाधन विभाग
सिचाई प्रमण्डल तारापूर मुंगेर के अभिलेखों की संवीÕा से पता चला कि साल 2008 से मार्च 2005 तक अनुमंडल पदाधिकारियों सिंचाई जमालपूर के विरूद्व 1.73 लाख रूपये की अग्रिम लम्बित थी। सतघरवा बांध के जीर्णेाद्वार हेतु कार्यपालक अभियंता ने साल 2005-06 के दौरान चार अवसरों पर कुल मिलाकर 12.90 लाख रूपये का अस्थायी अग्रिम प्रदान किया था। इस प्रकार मार्च 2008 तक सतघरवा बांध के मरम्मती एवं अनुरÕण कार्य हेतु 14.65 लाख रूपये की राशि अनुमंडल पदाधिकारियों ,सिंचाई अनुमंडल,जमालपुर के विरूद्व समायोजित पड़ी थी। इसी प्रकार पूर्ववर्ती अग्रिम प्रदान करने के पूर्व लंबित अस्थायी अग्रिमों के समायोजन को सूनिश्चित करने संबंधी अनुदेश दिसम्बर 1983 के अनुपालन में विफलता के कारण 14.07 लाख रूप्ये का दुर्विनियोजन हुआ। कार्यपालक अभियंता ने लेखापरीÕा को सूचित जनवरी 2010 में किया कि अनुमंडल पदाधिकरियों के विरूद्व 14.62 लाख रूपये के दूर्विनियोजन के लिए प्राथमिकी दर्ज सितंबर 2009 में की जा चुकी थी हालंाकि दिसम्बर 2009 तक कोई भी वसूली /समायोजन संबंधी प्रतिवेदन प्राप्त नहीे किए गए थे। मामला सरकार को मार्च 2009 में संदर्भित किए गए थे पर इस पर सरकार की ओर से कोई गंभीरता से कार्रवायी नहीं हुई।
स्वास्थ्य केन्दªों में अंतः संरचना की स्थिति गड़बड़
एनआरएचएम के अघीन एचएसपीसी के स्तर पर भारतीय लोक स्वास्थ्य मानक के अनुसार कुछ गारंटीयुक्त सेवाएॅं /सहायक अंतः संरचनात्मक सुविघाॅए संनिश्चित किया जाना था नमूना जाॅंचित 10 जिलों में नमूना जाॅंचित स्वास्थ्य केन्दªों के चिकित्सा पदाघिकारियों द्वारा प्रदत्त सूचना से ज्ञात हुआ है कि स्वास्थ्य में मूलभूत सुविधाएं जैसे पुरूष एवं महिलाओं के लिए पृथक प्रसाधन कÕ भर्ती मरीजों के परिचारकों हेतु रिहायशी सुंविघाएं तथा चिकित्सकीय अपव्यय पर प्रबंघन सुविघा अनुपलब्घ थी। अन्य मुलभूत अंतःसंरचना भी अघिकांश पीएचसी एवं आरएचएससी में अनुपलब्घ थी। साथ ही बाॅयल एपरेटस कारडियेक माॅनीटर शल्य कÕ के लिए भेन्टीलेटर,आॅक्सीजन सिलिंडर आदि जो आरएच तथा पी.एच.सी के शल्य कÕ के लिए आवश्यक उपकरण हैं, किसी भी नमूना जाॅंचित 20 आरएच और 122 पीएचसी में उपलब्घ नहीे थे। भारतीय लोक स्वास्थ्य मानको ंके अनुसार प्रत्येक आरएच में रक्त संग्रहण इकाई प्रचालित की जानी थी लेकिन यह किसी भी नमूना जाॅंचित रेफरल अस्पतालों में उपलब्घ नहीे था। इनकी अनुपस्थिति में आपातकालीन देखभाल के लायक मरीजों को इससे वंचित रहना पड़ा। एनआरएच एक के दिशा निर्देशों के अनुसार प्रत्येक पीएचसी एवं आरएच में इनडोर मरीजों हेतु क्रमशः छह एवं 30 शय्याएॅं प्रति 2000 जनसंख्या पर 1 शयया आवश्यक थे। सभी नमूना जांचित जिलों की कुल जनसंख्या 280.88 लाख में केवल 700 शय्याएॅं प्रति 40,126 जनसंख्या पर 1 शय्या उपलब्घ थे। इनडोर मरीजों की संख्या आरएच में वर्ष 2005-06 में 132021 से बढ़कर वर्ष 2008-2009 में 244526 हो गयी जबकि शय्याएॅं तथा अन्य अंतः संरचनात्मक संुविघाॅए अपर्याप्त थी।

रेफरल अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी

नमूना -जांचित 20 आर एच में स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी थी, विशंेषज्ञ डाॅक्टरों की कमी 29 से 100 प्रतिशत थी। भागलपुर,किशनगंज और शेखपुरा जिले के आर एच में कोई विशेषज्ञ डाॅक्टर नहीं थे। हालाॅंकि नमूना जाॅचित 35 पीएचसी में 48 विशेषज्ञ डाॅंक्टर थे जबकि मानकों के अनुसार आरएच में उनकी सेवाएं आवश्यक थी।
आशाओं की नियुक्ति एवं प्रशिÕक्षण के बाद भी लक्ष्य पूर्ण नहीं
एनआरएचएम के अघीन स्वास्थ्य केन्दªों और ग्रामीण जनसंख्या के बीच एक कड़ी के रूप में प्रमाणिक समाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा की अवघारणा प्रारंभ की गई । पाॅंच माॅड्यूल का प्रशिÕण प्राप्त करने के बाद आशा,ग्रामीणों को स्वच्छता , टीकाकरण प्राथमिक चिकित्सालय देखभाल करने और मरीजों को स्वास्थ्य केन्दª तक ले जाने के लिए प्रश्Õिित हो पाती । आशाओं को गर्भवती महिलाओं की पहचान करने और संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने के रूप में दिया जाना था । मिशन कार्यकलापों की समय रेखा के अनुसार वर्ष 2008 में ही आशाओं का शतप्रतिशत चयन एवं प्रशिÕण हो जाना चाहिए था । जबकि मार्च 2009 तक राज्य में 87135 आशाओं की निर्घारित आवश्यकता के विरूद्व 6750677 प्रतिशत आशाएॅं चयनित हुई। इनमें से नमूना जाॅंचित जिलों में 268956 आशाओं के चयन के लक्ष्य के विरूद्वकेवल 20783 आशाएॅं चयनित की गई जिसमें से केवल 187367 68 प्रतिशत आशाओं को प्रथम माड्युल का प्रश्Õिण दिया गया । आशाओं को निर्घरित पाॅंच माड्यूल का प्रशिÕण नहीं दिए जाने के कारण उन्हें ग्रामीण जनता को प्राथमिक स्वास्थ्य की देखभाल से संबंघित सलाह/सेवा की जानकरी नहीं हो पाई जिसके उनके चयन का मूलभूत मकसद पूरा नहीं हो सका।
एनआरएचएम के दिशानिर्देशों के तहत राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा आशाओं के प्रशिÕण एवं कार्यो का मूल्यांकन किया जाना अभी शेष था एस.सी में आशाओं की साप्ताहिक बैठक और पीएचसी के उपलब्ध नही था । आशाओं की सेवाएॅं मुख्यतः गर्भवती महिलाओं को पीएचसी / आरएच तक सुरÕित रूप में पहुंचाने का था पर परिकल्पित समुदाय को स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण उद्देश्य आंशिक रूप से ही पूर्ण हो सका।
स्वास्थ्य केन्द्रों पर डाक्टर अनुपलब्ध
नमूना जाॅंचित जिलो में आउटडोर मरीजों की संख्या वर्ष 2005- 06 में 9.31 लाख थी जो वर्ष 2008-09 में 61.33 लाख से अघिक हो गई। लेकिन चयनित 122 पीएचसी और एपीएचसी से 27 पीएच और 134 एपीपचसी में मरीजों के लिए बाह्य - रोगी विभाग सुविधा उपलब्घ नहीं थी क्योंकि इन केन्दªों में कोई डाॅक्टर पदस्थापित नहीं थे।
जननी सुरक्षा योजना में लूट
प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य आरसीएच योजना की शुरूआत वर्ष 1997 में की गयी और इसका दूसरा चरण वर्ष 2005-2006 में प्रारंभ हंुआ। इसके महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित करना था तािक नवजात एवं मातृ-मृत्यु-दर को कम किया जा सके। संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने के लिए जननी सुरÕा योजना जेएसवाई के तहत राज्य की सभी गर्भवती महिलाओं को , उनकी उम्र और पूर्व में उनके बच्चांें की संख्या पर घ्यान न देते हुए ,1400 रूपये के नकद प्रोत्साहन का प्रावघान किया गया था। महिलाओं की सहायता करने वाली आशाओं को भी 200 रूपये का नकद प्रोत्साहन दिया गया था जिसमें लाभार्थियों को स्वास्थ्य इकाईयों तक पहुॅंचाने तक का परिवहन लागत भी सम्मिलित था। नमूना जाॅंचित जिलो में संस्थागत प्रसवों की संख्या वर्ष 2005-06 में 2344 थी जो वर्ष 2008-09 में तेजी से बढ़कर 2.54 लाख हो गयी जिसका मुख्य कारण प्रसूती महिलाओं को नकद प्रोत्साहन का प्रावघान था। पूरे राज्य और नमूना जाॅंचित स्वास्थ्य इकाईयों में वषर््ा 2005-2009 में दौरान किए गए।
भारत सरकार द्वारा निर्घारित दिशा निर्देशों अक्टूबर 2006 के अनुसार जेएसवाई के लाभार्थियों को केन्दªों को छोड़ने के पूर्व या प्रसव के सात दिनों के भीतर ही भुगतान किया जाना था। हालांकि स्वास्थ्य ईकाईयों में समय निघि उपलब्घ नहीं रहने के कारण 4,70,307 लाभर्थियों में से 97,146 21 प्रतिशत को भुगतान नहीं किया जा सका। वर्ष 2005-09 के दौरान 3.73 लाख लाभर्थियो को 51.20 करोड़ रूपये का भुगतान किया गया जिसमें से 1,82037 लाभर्थियों को आठ से 732 दिनो ंकी देरी के बाद 25.19 करोड रूपये का भुगतान किया गया। लाभार्थियों को देरी से भुगतान किए जानंे या भुगतान नहीं किए जाने के कारण उन्हें प्रसवोपरांत देखभाल प्रदान करने संबंघी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण उद्देश्य विफल रहा। नमूना जांचित जिलों में से 298 मामलों में पाया गया कि दो माह में एक ही महिला का फोटो लगा कर उसके नाम पर पांच बार जननी सुरक्षा राशि की निकासी कर ली गयी।
जेनेरेटर पर अनौचित्यपूर्ण व्ययः 44.30 लाख रूपये
भोजपुर एवं मुजफरपुर जिलों में जुलाई 2006 से ही जेनरेटर सेवा निजी एजेंसी को आउटसोर्स की गयी थी । एजेंसी को स्वास्थ्य ईकाईयों में 24 घंटे विधुत आपूर्ति की जानी थी। अतःश्शीत श्रृंखला प्रणाली को संधारित करने के लिए अलग से निघि की आवश्यकता नहीं थी । भोजपुर जिले के पी.सी. और आर. एच. द्वारा 25.70 लाख रूपये के व्यय प्रतिवेदित किए गए थे जबकि मुजफरपुर जिला में 18.60 लाख रूपयें व्यय किए गए थें चूॅकि सभी स्वास्थ्य को आएटसोर्स एजेन्सी के जेनेरेटर से विघुंत की प्रप्ति होती थी अतः अतिरिक्त जेन सेट के परिचालन पर 44.30 लाख रूपये का अतिरिक्त व्यय औचित्यपूर्ण नहीे था। मुजफरपुर के असैनिक शल्य चिकित्सालय -सह-मुख्य चिकित्सा पदाघिकारी द्वारा लेखापरीÕा आपत्तियों को अस्वीकार किया गया तथा आर.एच.एवं.सी.से पा. ओ. एल. मद में किए गए अतिरिक्त भ्ुागतान की वसूली का आदेश दिया गया नवंबर 2009 ।
ग्रामीण कार्य विभाग के कार्यो में भी अनियमितता
सड़कों के चयन एवं प्राथमिकता निर्घारण के लिए दिशनिर्देशों के लिए प्रतिकूल मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत् 72 सड़कों का गलत चयन किया गया । सरकार ने इस योजना के लिए 1339.14 करोड़़ रूपये का पर्याप्त आवंटन उपलब्घ कराया तथापि वर्ष 2006-09 के दौरान बिहार ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के पास उपलब्घ निघि की तुलना में व्यय 10 से 47 प्रतिशत के बीच था ।
वर्ष 2006-08 के दौरान 982 सड़कों के लिए क्रियान्वित 1730.90 करोड़ रूपये के एकरारनामा के विरूद्व मार्च 2009 तक सिर्फ 392.40 प्रतिशत सड़कों का निर्माण ही पूरा हो सका। 2008-09 में चयनित कार्यो में से कोई्र भी नया कार्य प्रारंभ नहीं किया जा सका। प्रशासनिक स्वीकृति से कार्य केे प्रारंभ होने तक विभिन्न स्तरोे में 33 महीने तक प्रकियात्मक विलंब हुआ। एकरारनामा छानबीन किए गए बगैर एक ही संवेदक को एक से अघिक कार्य आंवटित किए जाने एवं एकरारनामा के Õतिपूर्ण शर्तो को प्रभावी नहीं किए जाने से सडक कार्यो के क्रियान्वयन में विलंब हुआ। एकरारनामा के अनुसार सडक निर्माण में प्रयोग की गई सामग्रियों की सत्यता एवं मानक सुनिÕित नहीं किए गए। ़कार्य की गुणवत्ता की जांच के लिए जिला या राज्य स्तर पर गुणवत्ता अनुश्रावक नियुक्ति नहीं की गई। उच्चाघिकारीयों के द्वारा आवघिक अनूश्रण नहीं किए जाने के कारण योजना की सामयानुगत प्रगति एवं कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकी ।
परियोजना प्रतिवेदन तैयार करने एवं सड़कों के चयन में विलंब
सचिव ग्रा.उ का.वि. ने सड़कों के चयन से योजना के क्रियान्वयन तक एक समयबद्व कार्यक्रम हेतु निर्देश निर्गत अगस्त 2006 किया। इसके अनुसार प्रोफार्मा ‘क’ एवं ‘ख‘ को तैयार करना संबंधित प्रखंड विकास पदाघिकारियों द्वारा आॅंकडा़ें की जांच एवं सत्यापन तथा जिला समिति की बैठक 20 अगस्त तक तैयार कर लेना था। 15 सितम्बर 2006 तक संबंघित जिलाघिकारी /आयुक्त द्वारा प्राशासनिक अनुमोदन एवं तकनीकी स्वीकृति प्रदान कर देनी थी एवं अक्टूबर 2006 के अतं तक कार्य प्रारंभ कर देना था। एक करोड़ रूपये तक एवं एक करोड़ रूपये से अघिक के कार्यो को क्रमशः 15 मार्च 2007 एवं 15 जून 2007 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्घारित था।
यह पाया गया कि 2006-22007 के लिए यध्पि नमूना जाॅंचित 12 जिलों में से 9 मे सड़को ंके चयन का कार्य जि.सं. समि. द्वारा समय से पुरा कर लिया किन्तु प्रशासनिक स्वीकृति में दो से 27 महीने का विलंब हुआ जिसके कारण कार्य प्रारंभ करने में भी दो सौ तैतीस महीनो क विलंब हुआ। अतः ग्रा.का.वि. कार्य प्रमण्डल विभाग द्वारा तय समय में कार्य संपन्न करने में विफल रही जिसके कारण 2006-07 हेतु क्रियान्वयन के लिए चयनित 102 सड़कें अगस्त 2009 तक अपूर्ण रहे। विभाग ने बताया दिसंबर 2008 के नए कार्यक्रम हाने के कारण कुछ प्रारंभिक समस्याएॅं दूर की जा रही हैं एवं पहले से बेहतर कार्य होने की संभावना है। परन्तु समय बीतने पर सुघार केे बदले 2008-09 में इस योजना के अंतर्गत ले जाने वाली सड़को ंके चयन को अंतिम रूप देने के लिए जि.समि. की बैठक भी नहीं हो सकी थी।
एक ही संवेदक को एक से अघिक कार्य का आवंटन
निविदा आमंत्रण सूचना नि.आ.सू के कंडिका 23 के अनुसार किसी संवेदक को एक से अघिक कार्य तभी आंवंटित किया जा सकता है जब कि उस संवेदक द्वारा पूर्व- आंवटित कार्य संपन्न कर दिया गया हो अथवा उसकी प्रगति संतोषाजनक हो। उक्त शर्त को पुरा नहीे करने वाले संवेदक की तकनीकी निविदा को भी खोलने पर विचार नहीं किया जाना था।
निविदा निस्पारण से संबंघित अभिलंेखों की जाॅंच के क्रम में यह पाया गया कि 17 नमूना जॅंांचित प्रमंडलों में से 8 प्रमंडलों मंे ंवर्ष 2006-08 के दौरान उपर्युक्त मापदंड के विपरीक्त 23 संवेदकों को दो से 10 कार्य आवंटित किए गए । 105.95 करोड़ रूपये के लागत के 79 कार्य 23 संवेदकों को आवंटित किए गए। इनमें से 51 कार्यो के एकरारनामा फरवरी से अगसत 2007 के बीच किए गए । सभी 79 कार्य प्रारंभ हाने के 9 महीनों के अन्दर पूरा कर लिये जाने थे। लेकिन संवेदक की Õमता से अघिक कार्य आवंटित कर दिए जाने के कारण 798 कार्यो में से 86.59 करोड रूपये लागत के 56 कार्य 55.46 करोड रूपय के व्यय के बावजूद अगस्त 2009 तक पूरे नहीं हो सके थें । सभी 8 प्रमंडलों के कार्य अभियंता ने लेखापरीक्षा द्वारा उठाए गए तथ्यों को स्वीकार किया विभाग द्वारा लेखापरीक्षा के तथ्यों को स्वीकार दिसंबर 2009 करते हुए कहा गया कि येाजना के कार्यान्वयन में विलंब का मुख्य कारण एक ही संवेदक को एक से अघिक कार्य आवंटित करना एवं सक्षम संवेदक की कमी थी । इस प्रकार नि.त्र आ. सू के शर्तो को नहीं अपनाने ंके कारण योजना पूर्ण हेाने में दो वर्ष से ज्यादा का समय लगा जिसके कारण छोटे-छोटे गाॅंवों व गाॅंववासियों को जल्दी सड़क सयुक्तता प्रदान करने के याजना के मूल उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकी।
निघियों की विमुक्ति में विलंब
रा.स.वि.यो. दिशानिर्देशों की कंडिका 2.2 के अनुसार राज्य सरकार को , भारत सरकार से प्राप्त निघियों की प्रप्ति के 15 दिनों के अन्दर जि.ग्रा.वि अभिकरणों को कारण विमुक्त कर देना था।
हालाॅंकि , संवीÕा ने दर्शाया कि राज्य द्वारा नमूना-जांचित जिलों को निघियाॅं विमुक्त किए जाने में 27 से 121 दिनों विलम्ब था। पुनः सरकारी निदेशासुनार जुलाई 2007 कार्यकारी अभिकरणों को 65 प्रतिशत निधियां प्रशासनिक स्वीकृतीयों के साथ बतौर अग्रिम प्रथम किस्त प्रदान की जानी थी । 203 मामलों में कार्यकारी अभिकरणों को 26.99 करोड़ रूपये विमुक्त किए जाने में सात से 144 दिनों का विलम्ब था।इन विलम्बों के कारण समय कार्य पूर्ण नहीं किए जा सके ।
लघु खनिजों का संदेहास्पद उपयोग
बिहार लघु खनिज नियमावली ,1972 के नियम 40(10) के अनुसार कार्य विभाग/ कार्यालय किसी भी अनुबंघ के तहत कोई विपत्र तब तक पा्रप्त नहीं कर सकता था जब तक कि कथित विपत्र लघु खनिाजों के क्र्रय स्रोत, भुगतान राशि एवं अघिपा्रप्त मात्रा दर्शाते प्रपत्र ‘एम’ ,एन एवं से संलग्नित न हो । इसे संविदा कि विेशेष शर्तो के उपबंघ 28 में भी दोहराया गया, अक्दूबर 2001 था। आगंे ,संविदा की विेशेष शर्तो का उपबंघ 16 कार्यारंभ पूर्व सामग्रियांे के नमूनों की अग्रिम स्वीकृति का लिया जाना भी विहित करता था। प्रमंडलों को संबंधित खनन कार्यलायों में लघु खानिजों के उठाव की जाॅंच हेतु प्रपत्र ‘एम’ तथा ‘एन’ भेजना था। पर अभिलेखों की संवीÕा ने दर्शाया कि 13 प्रमण्डलों ने 171 संविदाओं मंे नमूनांे की बिना स्वीकृत किए बिना प्रपत्र ‘एम ‘एन’ तथा ‘एफ’ प्राप्त किये जाने और बिना संबंघित खनन कार्यालयों से उत्पादित लधु खनिजों को सत्यापित किए। लघु खानिजों की ढुलाई पर
6.16 करोड़ रूपये का भुगतान किया।
इस प्रकार विनिर्दिष्टं ंगुणवत्ता एवं आवश्यक मात्रा में लघु खनिजों के उपयोग को सुनिश्चित नही किया जा सका।
ये है राजग का अलकतरा घोटाला
संविदा अक्टूबर 2001 की विशेष शर्तो के उपबंध 18 बी.सी.एवं एफ सह-पठित जुलाई 1991 के विभागीय पत्र के अनुसार अलकतरा केवल भारत सरकार के उपक्रमों से ही अघिप्राप्त किया जाना था तथा संवेदकों को अलकतरा पा्रप्ति के 48 घन्टे के भीतर कार्यपालक अभिंताओं को उसका अभिलेख प्रस्तुत करना था।
अलकतरा की खपत उसके जाॅंच में गुणवत्ता के संतोषप्रद पाये जाने के बाद ही की जानी थी। चार कार्यकारी प्रमंडलों के अभिलेखांे के नमूना जांॅंच ने उद्धाटित किया कि भुगतान 445.22 मेट्रिक टन. अलकतरे ,जिसका लागत 17.71 लाख रूपये थी, के बीजक/क्रय प्रमाणक नहीं थे। ग्रा.का.वि मुजफरपुर एवं पथ निर्माण विभाग, भोजपुर के कार्यपालक अभियंताओं ने कहा कि क्रय प्रमाणकों की प्रप्ति के बाद ही भुगतान किये गये थे। अभिलेख ,हालाॅंकि उत्तर का समर्थन नहीं करते थे।
मनपसंद संवेदकों को अघिक भुगतान
चार नमूना -जाॅंचित जिलों के नौ प्रमंडलों के अभिलेखों की संवीÕा ने उद्धटित किया कि 175 कार्यांे पर 55.99 लाखों रूपये का अघिक भुगतान मनपसन्द संवेदकों को किया गया।
बिना सत्यापन के वेंडरों केा भुगतान किया गया
निर्घारित कार्यप्रणाली के अनुसार , वेंडरों के सभी भुगतान प्रविष्टि डाटा के प्रथम स्तर की जाॅंच सूची प्रिंट आउट्स के पा्रप्त हाने के बाद किया जाना था । इस परियोजना में उपयोग में लायें गयें सभी तंत्रों एवं औजारों को वेंडरों को अपने मूल्य पर उपलब्घ तथा अनुरÕण करना था।
हालाॅंकि ,समस्तीपुर जिला में पाया गया कि 750 राजस्व गॅंावों जहाॅं डाटा प्रविष्टियों पूर्ण थी, में से े केवल 132 गाॅंवों की जाॅंच सूची वेंडरों द्वारा निर्गत की गया थी । विभाग वेडरों को 14.98 लाख रूपये का भुगतान जून 2005 से अगस्त 2007 उनके कार्यो / सेवाओं को सत्यापित किये बिना किया गया । यह भी पाया गया कि वंेंडर कार्य पूर्ण नहीं कर सके एवं भंुगतान प्राप्त करने के बाद कार्य के बीच में छोड़कर चले गये थे ।
व्यय का समाशोघन नहीं किया गया
विभाग द्वारा दशम् वित्त आयोग 1995-2000 की अवघि से 2008-09 तक के सी. आर. एफ. लेखा शेष का महालेखाकार के उपर्युक्त अवधि के लिए एस. सी. आर. एफ. सी. द्वारा वर्षवार व्यय अनुमोदन के साथ- साथ आर.एफ. के केन्दªीय अंश और राज्य अंश के विस्तृत विवरण को समर्पित करने के लिए कहने अगस्त 2009 के बावजूद महालेखाकार की पुस्तिकाओं के साथ समाघान नहीं किया गया था । आपदा प्रबन्घन विभाग ने बताया दिसम्बर 2008 के वर्ष 2000 से सी.आर.एफ. का आंशिक समाधान कर लिया गया है और 1995 से 2000 के तक के व्यय सी.आर.एफ. से डेबिट किये जाने की प्रकिया आरम्भ कर दी गयी है।
आकस्मिक सार विपत्रों का समायोजन नहीं किया गया
आकस्मिक सार ए.सी. विपत्रों पर आहरित घन राशि के लिए ब्यौरवार आकस्मिक डी.सी. विपत्र कोषगार से उनका आहरण किये जाने की तिथि से अगले 65 महीने की 25 तारीख तक महालेखाकार को समर्पित किया जाना वांछित है, जिसमें विफल हेाने पर ए.सी विपत्रों पर किसी भी अगले आहरण की अनुमति नहीं थी। अभिलंेखों की छानबीन से पता चला कि नमूना जाॅंचित जिलों में 2006-09 की अवघि से सम्बन्घित 627.20 करोड़ रूपये के ए.सी विपत्रों को महालेखाकार को समर्पित कर समायोजन किया जाना लम्बित था ।
लेखाओं के संघारण में त्रुटियां
बिहार कोषागार संहिता प्रावाघान करता है कि सभी मैदिªक संव्यवहारों की प्रविष्टि रोकड़ बही मे तुरंत की जानी चाहिए और प्रत्येक माह के अन्त में कार्यालय प्रघान द्वारा नकद शेष का सत्यापान किया जाना चाहिए। यह देखा गया था कि सोनबरसा अंचल सहरसा में अगस्त 2007 से रोकड़ बही का संघारण नहीं किया गया था जबकि डी.डी.एम.ए. पटना की रोकड़ बही में फरवरी 2007 से संव्यवहारों का सत्यापन अगस्त 2009 नहीं किया गया था । अंचल अघिकारी ,सोनबरसा ने बताया कि अगस्त 2009 को सोनबरसा अंचल में रोकड़ बही का संघारण नहीं किया गया था क्योंकिं पिछली रोकड़ बही का प्रभार नही दिया गया था जबकि ए.डीएम,पटना ने कहा सितम्बर 2008 कि रोकड़ बही में संव्यवहारों को सत्यापित किये जाने के लिये रोकड़ बही प्रभारी अघिकारी के पास भेजा जायेगा ।
कपटपूर्ण भुगतान
पूर्णिया जिले के बनमनखी अंचल कार्यालय में सी.आर. एफ. से सेना का एक मोटरबोट चलाने हेतु पेट्रोल खरीदने के लिए 7034.80 रूपये के विरूद्व से 7034.80 रूपये का भुगतान कर 0.63 लाख रूपये का दूर्विनियोजन किया गया था सितम्बर 2008। आपदा प्रबन्घन विभाग ने बताया अक्टूबर 2009 कि एजेन्सी से 0.63 लाख रूपये की वसूली कर ली गई है।
कार्य योजनाओं की तैयारी में भी गड़बड़ी
राज्य स्वास्थ्य समिति को स्वास्थ्य सेवा की उपलब्घता में व्याप्त रिक्तियों, घटक संभावित निवेश, मिशन अवघि 2005-12 में केन्द्रांश और राज्यांश की आवश्यकता की पहचान तथा परिपे्रक्षित योजनाओं के रूप में विŸाीय एवं भौेतिक लक्ष्य का निर्घारण करना था । संपूर्ण राज्य के विभिन्न जिलों के लिए परिपे्रंक्षित योजनाएं तैयार की जानी थी । उपलब्घ संसाघनों एवं उनकी प्राथमिकता के आघार पर गांव से लेकर प्रखंड स्तरों तक वार्षिक कार्यक्रम कार्यान्वयन योजना पीआईपी तैयार किया जाना था पर राज्य/जिला/स्वास्थ्य समिति के अभिलेखों की संवीक्षा में पाया गया कि वर्ष 2005-09 के दौरान न तो परिप्रेक्षित योजना और न ही वार्षिक योजना तैयार की गयी थी। हालांकि राज्य स्वास्थ्य समिति ने वर्ष 2006-07,2007-08 तथा 2008-09 के लिए कार्यक्रम कार्यन्वयन योजना पीआईपी तैयार किया जिसे राष्ट्रीय कार्यक्रम समन्वय समिति द्वारा अनुमोदित किया गया।
विŸाीय निष्पादन में टालमटोल
वर्ष 2006-2007 तक भारत सरकार द्वारा विŸा प्रदान किया गया । वर्ष 2007-08 से भारत सरकार एवं राज्य सरकार के मघ्य निघिकरण की भागीदारी 85ः15 के अनुपात में की जानी थी। विमुक्त एवं उपयोग किए गए निघि से संबंधित अभिलेखों एवं राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा लेखापरीक्षा को उपलब्घ कराए गए विŸाीय विवरणियों की संवीक्षा से निम्नलिखित प्रकट हुएः
वर्ष 2005-09 के दौरान पीआईपी में प्रस्तावित 1842.05 करोड़ रूपये की राशि के विरूद्व, भारत सरकार द्वारा 2005.42 करांेड़ रूपये स्वीकृत किए गए लेकिन उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं समर्पित किए जाने के कारण/ देरी से समर्पित किए गए। उपयोगिता प्रमाण पत्र समर्पित नहीं किए जाने/ विलंब से किए जाने का कारणों की मांॅगें सितंबर 2009 के बावजूद सूचित नहीं किया गया । तालिका स. 1 में 2005-09 के दौरान राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा प्राप्त किए गए अनुदान एवं ंकिए गए व्यय दर्शाए गए हैं: प्रत्येक विŸाीय वर्ष के अंत में अत्यघिक बचत रही । 2005-09 के दौरान राष्ट्रीय रोग नियंत्रण काय्रक्रम में 58.57 करोड़ रूपये अवशेष रह गया।
राज्य सरकार ने 2005-09 के दोैरान स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण हंेतु राज्य स्वास्थ्य समिति को 227.40 करोड़ रूपये विमुक्त किए। वर्ष 2007-08 के दौरान भवन निर्माण विभाग को स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण के लिए 162.88 करोड़ रूपये विमुक्त किए गए। तत्पश्चात राज्य स्वास्थ्य समिति ने नवंबर 2008 में निर्णय लिया कि इन स्वास्थ्य समितियों के माध्यम से किया जाये एवं भवन निर्माण ने राज्य स्वास्थ्य समिति को 112.78 करोड़ रूपये वापस कर दिया लेकिन 50.10 करोड़ रूपये की शेष राशि वापस नहीं की गयी क्योंकि संबंघित कार्यों की निविदा प्रक्रिया प्रगति में थी ।
वापस की गयी राशि बेंैक में रखी गयी थी। राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा विभिन्न कार्यकारी अभिकरणों को आवंटित कार्यो की विŸाीय एवं भौतिक प्रगति प्रतिवेदन संघारित की जानी चाहिए थी। राज्य स्वास्थ्य समिति ने बताया कि दिसंबर 2008 कि कार्यकारी अभिकरणों से विŸाीय एवं भौतिक प्रगति प्रतिवेदन उपलब्घ कराने हेतु किया गया था हालांकि माॅगे जाने के बावजूद अगस्त 2009 तक लेखापरीक्षा को ऐसा कोई प्रतिवेदन उपलब्घ नहीं कराया गया।
लेखाओं के संघारण में विसंगतियां
लेखाओं के दैरान पाया गया कि लेखाओं के मानक पुस्तक यथा रोकड बही, जर्नल , लेजर इत्यादि जिनका कि संधारण किया जाना था, राज्य स्वास्थ्य समिति स्तर पर संघारित नहीं किये गये थे। वर्ष 2008-09 के दोरान मात्र चेक निर्गत एवं प्राप्ति पंजी संघारित किए गए थे जबकि लेख अभिलेखों का समुचित संघारण नहीं किए जाने के कारण निम्न्लिखित विसंगितया हुई:
राज्य स्वास्थ्य समिति के अभिलेखों से 1 अप्रैल 2005 को प्रारंभिक अवशेष के रूप में चार भिन्न राशियाॅं 43.69 करोड़ रूपये से 52.67 करोड़ तक विस्तारित पायी गयी। भिन्न प्रारंभिेक अवशेषों के कारणों को लेखापरीक्षा की मांग किये जाने के बावजूद अगस्त 2009 तक प्रस्तुत नहीं किया गया। भारत सरकार को समर्पित सितंबर 2007 तक व्यय विवरण की संवीक्षा ने उद्धाटित किया कि तिमाहियों में गलत प्रारंभिक अवशेष पिछली तिमाही के अंतशेष की तुलना में अग्रेषित किए जाने के कारण राज्य स्वास्थ्य समिति के लेखाओं में 46.48 करोड़ रूपये कम दर्शाया गया। अप्रील 2005से सितंबर 2007 के दौरान राज्य स्वास्थ्य समिति से प्राप्त व्यय विवरणी में विभिन्न जिलों को अग्रमि के रूप में 383.74 करोड़ रूपये दर्शाया गया था लेकिन राज्य स्वास्थ्य समिति के पास उपलब्घ निघि के काॅलम में से सितंबर 2005 एवं जुलाई 2006 को समाप्त तिमाही के लिए मात्र 76.87 से नहीं धटाए गए थे शेष 306.87 करोड़ रूपये मूल उपलब्घ निघि से नहीं ध्टाए गए थे। यह भी व्यय विचरण के त्रुटिपूर्ण संघारण को इंगित करता हेै ।पुनः राज्य स्वास्थ्य समिति ने 2007-2008 की शेष अवघि अक्टूबर 2007 से मार्च 2008 के लिए भारत सरकार को राज्य व्यय विवरण के स्थान पर वित्तीय प्रबंघन प्रतिवेदन एफएमआर समर्पित मई 2008 किया था जिसमें आरंभिक एव अंतःकोष का जिक्र नहीं था जबकि प्रारंभिक अवश्ेाष में उपरोक्त वर्णित विसंगतियां पायी गयी थी। राज्य स्वास्थ्य समिति ने बताया कि दिसंबर 2008 कि लेखापरीक्षा टिप्पणियों को भविष्य के दिशानिर्देश के लिए अंकित कर लिया गया है। राज्य स्वास्थ्य समिति ने साल 2005-2008 के लिए लेखापरीक्षा को दो व्यय विवरणी के साथ बैंक पास बुक /विवरण और भारत सरकार /राज्य सरकार द्वारा अशंदानो ंकी विमुक्ति की प्रतियां उपलब्घ कराई।अगस्त और दिसंबर 2008 लेखापरीक्षा विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा भारत सरकार को प्रवेदित व्यय इन विवरणियों से 31.56 करोड़ रूपये की बढो़तरी का कारण राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा लेखापरीक्षा माॅंगे जाने के बावजूद नहीं दिया गया।
यह इंगित करता था कि राज्य स्वास्थ्य में वित्तीय प्रबंघन कमजोर था क्योंकि व्यय विवरणी वास्ताविक तथ्य एवं आॅंकडांे़ पर आघारित नहीें थे। बैंक खाताओं के अनियमित प्रचालन एवं ब्याज की हानि भारत सरकार और बिहार के मघ्य हस्तांतरित नवंबर 2006 के सहमति ज्ञापन एमओयू और एनआरएचएम के दिशा निर्देर्शों के अनुसार प्राप्त निघि को ब्याज अर्जित करने वाले एक बैंक खाता में रखा जाना था हालाकिं दिशा निर्देशों का उल्लंघन कर पांच राष्ट्रीयकृत बैंक की विभिन्न शाखाओं में 17 बैंक खाता प्रचालित किए गए थे। अपने जवाब में राज्य स्वास्थ्य समिति ने बताया कि दिसंबर 2008 कि रिथत बैंक खाताओं को बंद कर दिया जाएगा। इन बैंक खाताओं की अद्यतन स्थिति अगस्त 2009 में माॅगें जाने के बावजूद राज्य 106.76 करोड़ रूपये का एक ड्राट पाया गया दिसम्बर 2006 जिसे ब्याज प्राप्त किए बगैर फरवरी 2007 में बिहार राज्य सहकारिता बैंक लिमिटेड में जमा किया गया। इसके कारण ब्याज मद में 1.25 करोड़ रूपये से चार विभिन्न बैंक खाताओं में हस्तान्तरित किए जाने के कारण राज्य स्वास्थ्य समिति को 0.86 करोड़ रूपये ब्याज की हानि हुई। कुल हानि 2.11 करोड़ रूपये थी। जवाब में राज्य स्वास्थ्य समिति ने बताया दिसंबर 2008 कि विभिन्न बैकों में निघि रखे जाने की अनिवार्यता के कारण पदाघिकारी के आदेशानुसार निघि का हस्तातंरण किया गया था । 106.76 करोड़ रूपये के बैंक ड्राट के देरी से जमा किए जाने और मघ्य माह में निघि के हस्तातंरण का कोई औचित्य संसुूचित नहीं किया गया। इस प्रकार एक बैंक खाता रखने से एनएचएम कीश्दिशा निर्देशों का पालन नहीं किए जाने के कारण राज्य स्वास्थ्य समिति को ब्याज की हानि हुई।
ंराशि रहते व्यय नहीं किया गया
भारत सरकार ने वर्ष 2005-2009 के दौरान 15 क्रियाकलापों के कार्यान्वन के लिए 15822 करोड़ रूपये विमुक्त किया था ।
ये ग्रामीण स्वास्थ्य योजनाओं एवं जिला स्वास्थ्य योजनाओं के निर्माण तथा स्वास्थ्य केन्दªों के उत्क्रमण आदि से संबंघित थे हालांकि यह पाया गया कि सात क्रियाकलापों में 63.10 करोड़ रूपये उपलब्घ रहने के बावजूद व्यय नहीं किये गये थे जो कि क्रियाकलापों के निष्प्रभावी कार्यान्वयन को ईगित करता था। सरकार की कार्यप्रणाली को देखने से यह तो कहा ही जा सकता है कि इस सरकार के कार्यकाल में भी नियमों की अंदेखी हुई और उसे ताक पर रखकर वह सब किया गया जिसे गैर कानूनी कहा जा सकता है।
साभार सीएजी रिपोर्ट