शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
औषधि जांच मशीन सात वर्षों तक पड़ी रही
औषधि नियंत्रण विभाग के आलाधिकारियों एवं नकली दवा निर्माताओं की सांठ-गांठ के कारण पटना स्थित औषधि प्रयोगशाला में मशीन आ जाने के बावजूद अब तक हाई परफारमेंस लिक्विड को मेटोग्राफी (एच.पी.एल.सी) मशीन स्थापित नहीं हो पाया है, जबकि भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला (बीडीसीएल) अगमकुंआ, पटना को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए 10.18 लाख रुपये की लागत वाली यह मशीन सितम्बर 2002 में ही उपलब्ध करा दी थी. जिस पर इसके बावजूद सात वर्षों तक मशीन यूं ही पड़ी रही कैग ने गंभीर आपत्ति जताते हुए सरकार से स्पष्टïीकरण तलब किया है. राज्य की पिछली राजद सरकार के कार्यकाल, सितम्बर 2002 में ही भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए हाई परफारमेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी मशीन प्रदान किया था. पर इसे स्थापित करने के लिए स्वास्थ्य निदेशालय ने बीडीसीएल को 15.43 लाख रुपये प्रयोगशाला के नवीकरण एवं मशीन की स्थापना के लिए जून 2007 में उपलब्ध कराया इस राशि में से बीडीसीएल ने, 3.95 लाख रुपये कार्यपालक अभियंता, पी.डब्लूडी को विद्युत कार्य के लिए और 4.07 लाख रुपये खाद्य प्रयोगशाला के सिविल कार्य के लिए उपलब्ध कराया था जबकि सिविल कार्य के प्राक्कलन की स्वीकृति आदेश की प्रत्याशा में विभाग ने 7.41 लाख रुपये की राशि को बैंक में जमा रखा. उधर विभाग ने जुलाई 2008 तक प्राक्कलन को स्वीकृत नहीं किया था. इस प्रकार औषधि परीक्षण प्रयोगशाला के भवन का सिविल व मरम्मत कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया. इतना ही नहीं विद्युत कार्य भी प्रारंभ नहीं हो सका. इसके लिए औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला ने कोई पहल भी नहीं और न ही खाद्य प्रयोगशाला के संबंध में सिविल कार्य का अनुश्रवण ही किया इसके बावजूद बीडीसीएल के प्रभारी अधिकारी में जुलाई 2008 में मशीन करने परिचालन में बता कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया जिस पर कैग ने, आपत्ति जताते हुए उनका जवाब स्वीकार्य नहीं किया उनका तर्क था कि कोई सिविल या विद्युत कार्य प्रारम्भ नहीं किया फिर किस प्रकार मशीन कार्य करने लगा. प्रभारी अधिकारी ने अक्टूबर 2008 में कैग को फिर सूचित किया कि प्रशिक्षित स्टाफ की अनुपलब्धता के कारण औषधि प्रशिक्षण नहीं हो सका जिसके लिए विभाग से पत्राचार किया गया फिर भी प्रीाारी आधारभूत संरचना की स्थिति एवं मशीन के परिचालन के बारे में व मौन रहे प्रभारी का जवाब कि मशीन का कोई परीक्षण कार्य नहीं किया गया इस बात को ठोस करता है कि मशीन निष्क्रिय था. इस प्रकार सात वर्ष पहले 2002 में भारत सरकार द्वारा जो मशीन प्रदान किया गया था उसे छह वर्ष बाद 2008 तक भी स्थापित एवं प्रचालित नहीं किया जा सका. परिणामस्वरूप औषधि परीक्षण के वांछित उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया जा सका और मशीन के साथ-साथ निधि भी अवरूद्घ रहा. कैग ने पूरे प्रकरण को साभार के समक्ष रखते हुए जवाब तलब किया है, पर सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली है.
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