शनिवार, 26 सितंबर 2009
इस झटके से उबरने में लगेगा समय
शमशाद पटनाः अभी मई में राजग खेमे में लोकसभा की 33 सीटों पर जीत हासिल करने के जष्न की छमाही भी पूरी नहीं हुई कि विधानसभा उपचुनाव में उनका सारा मजा काफूर हो गया. यह क्या 18 में से नौ सीटों को राजद-लोजपा गठबंधन ने जीत लिया जबकि इनमें से ज्यादातर सीटें राजग की ही थी. यह कमाल कैसे हुआ. क्यों इस चुनाव में नीतीष-मोदी का जादू नहीं चला और क्यों राजद-लोजपा का पुर्नजन्म हुआ. खतरा यह है कि विधानसभा उपचुनावों के 18 सीटों के परिणामों से जब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उबरेंगे तब तक फाइनल मुकाबले की घड़ी आ जायेगी. यही कारण है कि राजग की इस करारी हार को राजद-लोजपा के लिए संजीवनी माना जा रहा है. अठारह में से नौ सीटों पर जीत के बाद राजद लोजपा कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह देखने से तो यही लगता है कि वे आगामी विघानसभा चुनाव में अभी से अपनी फतह मान लिये हंै दूसरी ओर राजग खेमे में घोर उदासी है.परिणाम को एक दूसरे पर थोपा-थोपी का सिलसिला अलग प्रारम्भ हो गया है.मुख्यमंत्री के कार्यकलापों पर भी प्रष्नचिन्ह लगाये जा रहे. हार के पीछे टिकटों के बंटवारे और बदबदलुओं को प्रश्रय देने पर भी निषाना साधा जा रहा है. कुल मिलाकर देखा जाए तो राजग उहापोह की स्थिति में है.आत्ममंथन जदयू और भाजपा दोनों खेमे में किया जा रहा है कि सुषासन में कहां चूक हुई कि जनता ने उन्हें ऐसा झटका दिया. फटे को रफू के प्रयास प्रारम्भ कर दिये गये हैं ताकि आगे सब ठीक ठाक रहे.बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है.18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं. दूसरी तरफ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं. राज्य में राजनीतिक हाषिये पर चली गयी कांग्रेस ने जदयू की दो सीटों को अपने कब्जे में कर दमदार वापसी की है. बहुजन समाज पार्टी ने भी एक सीट ले कर सबको चैंका दिया है जबकि निर्दलीय उम्मीदवार को एक सीट मिली है.बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था. रामविलास पासवान की लोजपा का तो सूपरा ही साफ हो गया था. स्वयं रामविलास पासवान चुनाव हार गये थे.इसके मद्देनजर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफी चैंकाने वाले हैं.कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की खामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं. राजग द्वारा टिकटों के बंटवारे में परिवारवाद को नकारने को भी हार के एक कारण के रूप में देखा जा रहा है. क्योंकि जिन सांसदों ने अपने परिजनों के लिए टिकट मांगे थे नहीं मिलने पर वे राजग द्वारा भेजे गये उम्मीदवारों को हराने में जुट गये. घोसी में तो सांसद जगदीष षर्मा ने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतार दिया और वे जीती भी. इस प्रकार उपचुनाव में राजग को अपनों के भीतरघात का भी सामना करना पड़ा. राजग के खिलाफ उनके दल के नेताओं का गुस्सा यूं ही नहीं है. जदयू के नेताओं का ही आरोप है कि फरवरी 2005 के उन दिनों को याद करें जब राज्य में नीतीष कुमार के नेतृत्व में सरकार बननी थी पर राजद के दबाव में राज्य में राष्ट्रपति षासन लागू कर दिया गया और बूटा सिंह को राज्य की कमान सौंप गयी थी. तब लोजपा तोड़कर नागमणि, नरेन्द सिंह जैसे नेताओं ने जदयू में षामिल होकर नीतीष कुमार को षक्ति प्रदान की थी. प्रभूनाथ सिंह, दिग्विजय सिंह,डा.मोनाजिर हसन, उपेन्द्र कुषवाहा जैसे नेता जदयू में पहले से ही मौजूद थे. नवम्बर 2005 में फिर से चुनाव हुए और राजग की सरकार बनी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीष कुमार विराजमान हुए. पर जैसे जैसे समय बितता गया नीतीष कुमार जदयू में मौजूद विभिन्न जाति के कद्दावर नेताओं का कद छोटा करना प्रारम्भ किया. पहले षिकार उपेन्द्र प्रसाद कुषवाहा हुए. जार्ज को अध्यक्ष पद से जलील कर हटाया गया. उसके बाद डा.मोनाजिर हसन से भवन निर्माण विभाग वापस ले लिया गया जबकि 2009 के लोकसभा के चुनाव में जार्ज फर्नांडीस, दिगिवजय सिंह और बेटिकट कर दिया गया जबकि प्रभूनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में वे प्रचार करने तक नहीं गये. इससे जदयू के आधार मतदाताओं में गलत संदेष चला गया परिणामस्वरूप प्रभूनाथ सिंह चुनाव हार गये. दिग्विजय सिंह का टिकट काटने और प्रभूनाथ सिंह के चुनाव प्रचार में न जाने को राजपूत मतदाताओं ने गंभीरता से लिया और मौके की तलाष में रहे. नजदीक में उपचुनाव मिल गया और उन्होंने अपना विरोध राजग के उम्मीदवारों के खिलाफ मत दे कर किया.कुछ यही स्थिति कुषवाहा नेताओं के साथ हुआ. उपेन्द्र कुषवाहा और नागमणी ने इस चुनाव में अहम रौल अदा किया. इसके अलावे सांसद बने विधायकों की पसंद को नजर अंदाज कर अन्य उम्मीदवारों को टिकट थमा देने के कारण स्थिति विस्फोटक हो गयी. मुंगेर में डा.मोनाजिर हसन की पसन्द के उम्मीदवार को ऐन वक्त पर टिकट से वंचित करने के कारण वे चुनाव प्रचार से अलग हो गये और मुंगेर गये ही नहीं जिससे वहां से जदयू उम्मीदवार हार गया और राजद उम्मीदवार की जीत हुई.नीतीष कुमार ने मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए कई अच्छे काम भी प्रारम्भ किये पर दूसरी ओर जदयू के पुराने व जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं का पर कतरना भी प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर वैसे जनाधारविहीन मुस्लिम नेताओं की जदयू में पूछ बढ़ा दी जो कभी चुनाव लड़े ही नहीं थे. इनमें अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष नौषाद अहमद, गुलाम रसूल वलियावी आदि को अनावष्यक तरजीह देने से जदयू के पुराने मुस्लिम नेताओं में आक्रोष बढ़ना प्रारम्भ हुआ और उनलोगों ने दल की गतिविधियों से खुद को अलग थलग करना प्रारम्भ कर दिया. इसे भी हार के मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है. उधर अन्य दलों से आये दलबदलुओं को जदयू में तरजीह दिये जाने के कारण मतदाताओं ने वैसे नेताओं के खिलाफ मत दिया परिणामस्वरूप फुलवारीशरीफ विधानसभा क्षेत्र से श्याम रजक और बोचहा से रमई राम चुनाव हार गये. उपचुनाव में हार का कारण बटाईदारी बिल का प्रचारित होना भी एक कारण माना जा रहा है जिससे गांव के किसान राजग के खिलाफ हो गये और समय रहते नीतीष कुमार से पल्ला झाड़ने में अपनी भलाई समझी और उन्होंने सत्ता के सेमी फाइनल में सरकार को यह जता दिया है कि कार्यसंस्कृति में बदलाव नहीं हुआ तो वे सरकार को ही बदल देंगे.उधर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार ने चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनके आधार मतों में कांग्रेस ने सेंधमारी कर ली जिससे राजद-लोजपा उम्मीदवारों को लाभ मिला साथ ही स्थानीय कारण भी इस उपचुनाव में हावी रहे दूसरी तरफ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित पुराने अंदाज में कहा कि सेमी फाइनल में जीत के बाद अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी.
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