शनिवार, 26 सितंबर 2009

बिहार में कांग्रेस से क्यों डरने लगी पार्टियां

पटनाः मुख्यमंत्री nitish कुमार ने चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा सावधानी हटी दुर्धटना घटी. यानि फिर से लालू का भय दिखाने का प्रयास प्रारम्भ. मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार लिया है कि कांग्रेस ने उनको नुक्सान पहुंचाया है. और उनके आधार मतों में सेंधमारी करने में सफल रही है. मतलब साफ है. आगामी विधानसभ चुनाव में कांग्रेस राजग और राजद लोजपा दोनों के लिए परेषानी खड़ी करने वाली है! गत लोकसभा चुनाव के दौरान राजद-लोजपा ने अपने खराब प्रदर्षन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था इस बार राजग कांग्रेस पर यह आरोप लगा रहा है.आखिर माजरा क्या है. क्या सही में मृतप्राय कांग्रेस पुर्नजीवित हो गयी है या फिर नीतीष कुमार राज्य के उन मतदाताओं को कांग्रेस की ओर जाने से रोकना चाहते हैं जिन्हें राजद-लोजपा से परहेज है! चुनाव परिणामों को देखने से तो यही लगता है कि कांग्रेस ने पुर्नवापसी की है. जिन दो सीटों पर उसने जीत दर्ज करायी है वह सीट राजद और राजग के आधार वोट बैंक से जुड़ा हुआ है. इस लिए कांग्रेस की पुर्नवापसी राजद-लोजपा और राजग दोनों के लिए परेषानी पैदा करनेवाली है. यह बात अलग है कि चुनाव परिणाम से ज्यादातर राजग के उम्मीदवार ही प्रभावित हुए हैं पर सिमरीबख्तियारपुर और चेनारी विधानसभा क्षेत्र के आधार मतों को देखा जाए तो साफ लगेगा कि राजग और राजद के आधार मतों पर समान रूप से कांग्रेस ने सेंधमारी की है. सिमरीबख्तियारपुर विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम व यादव बहुल क्षेत्र होने के कारण वहां से महबूब अली कैसर की जीत राजद-लोजपा के लिए झटका है जबकि चेनारी में सवर्ण मतदाताओं के प्रभाव वाले इस सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज कर राजग को करारा झटका दिया है. इन अठारह सीटों में से एक भी सीट कांग्रेस की नहीं थी पर उसने दो सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ताधारी दल भाजपा की बराबरी की है. इस उपचुनाव में भाजपा छह सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसने अपने दो उम्मीदवार जीताये जबकि जदयू बारह में से मात्र तीन सीट ही निकाल पायी. कांग्रेस ने दोनों सीटें जदयू से छीना है इसमें से सिमरीबख्तियारपुर की सीट कांग्रेस की परम्परागत सीट मानी जाती रही है. यहां से चैधरी सलाह उददीन लगातार जीतते रहे थे.अब उस सीट पर उनके पुत्र चैधरी महबूब अली कैसर चुनाव लड़ते हैं. गत विधानसभा चुनाव में वहां जदयू ने बाजी मारी थी. कांग्रेस की इस वापसी को दो नजरिये से देखा जा रहा है. पहला यह कि राजद-लोजपा से गत लोकसभा चुनाव के दौरान अलग हो चुनाव लड़ने और उपचुनाव में पुनः प्रयास के बावजूद राजद-लोजपा से समझौता नहीे कर कांग्रेस ने राज्य के उन मतदाताओं के लिए एक विकल्प खोल दिया है जो राजद और राजग दोनों की कार्यषैली से उब चुके थे. वैसे मतदाताओं ने नीतीष कुमार से मुक्ति के लिए कांगेस को अपना समर्थन दे दिया परिणामस्वरूप दो सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीत कर राज्य की अन्य राजनीतिक पार्टियों की चिन्ता बढ़ा दी है. कांग्रेस ने अठारह में दो कर परफार्म तब किया है जब उनके स्टार प्रचारक सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इस उपचुनाव में प्रचार के लिए नहीं आये. यह परिणाम बिहार प्रभारी जगदीष टाईटलर,सी.पी.जोषी और सलमान खुर्षीद जैसे केन्द्रीय मंत्रियों के साथ साथ प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष अनिल षर्मा की मेहनत का फल माना जा रहा है. 2010 में विधानसभा का फाईनल होने वाला है जिसमें कांग्रेस पूरे दम खम केसाथ उतरने की तैयारी में जुट गयी है.बिहार प्रभारी जगदीष टाईटलर ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस अब बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ेगी किसी के साथ समझौता नहीं करेगी यही कारण है कि जदयू और राजद-लोजपा दोनों की बेचैनी बढ़ी हुई है.बात यह है कि कांगे्रस के अकेले चुनाव मैदान में उतरने से जहां राजद-लोजपा को अपने आधार वोट बैंक अल्पसंख्यक मतों के खिसकने का डर खाये जा रहा है तो राजग को सवर्ण मतदाताओं का कांग्रेस के साथ चले जाने की चिन्ता है.यही कारण है कि उपचुनाव के दौरान राजद-लोजपा और राजग नेताओं के निषाने पर कांग्रेस पार्टी रही और गठबंधनों के बड़े नेताओं ने कांग्रेस की कमजोरियों को जम कर जनता के बीच उछाला.

एम्स की निर्माण लागत तीन गुणी बढ़ी

पटनाः पांच साल पहले पटना में बनने वाले जिस आल इंडिया इंस्टिच्यूट आफ मेडिकल साइंस पटना का डिजाइन देर से स्वीकृति होने के कारण लागत बढ़ गयी है विलंब के कारण इस संस्थान के निर्माण की लागत 332 करोड़ से बढ़कर 843 करोड़ रुपये हो गयी है.. निर्माण कार्य आरंभ करने के लिए अगले सप्ताह टेंडर निकाले जाएंगे. ज्ञात हो कि यहां आवासीय परिसर बन रहा है. अस्पताल निर्माण के लिए अगले सप्ताह टेंडर निकाल दिए जाएंगे. इसके निर्माण कार्य के लिए मंत्रालय ने कई तकनीकी एजेंसियों से सहयोग लिया है. अस्पताल के निर्माण में हिन्दुस्तान लैटेक्स लिमिटेड मंत्रालय को सहयोग करेगा. पहले यह काम हास्पिटल सर्विसेज कन्सेल्टेंसी कारपोरेशन के जिम्मे था पर इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए राज्य सरकार ने 100 एकड़ जमीन मुहैया करायी है. खगौल स्थित सिंचाई अनुसंधान परिसर की 33 एकड़ जमीन आवासीय परिसर और फुलवारीशरीफ स्थित वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट इंस्टीच्यूट में मुख्य भवन के लिए 77 एकड़ जमीन दी गयी है. संस्थान में मेडिकल की पढ़ाई भी होगी और प्रत्येक वर्ष सौ छात्र-छात्राओं का नामांकन हो सकेगा. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों की इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं होने के कारण ही अब तक इसके डिजाइन को स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. काउंसिल फार प्रोटेक्शन आफ पब्लिक राइट्स वेलफेयर की याचिका पर पटना उच्च न्यायालय ने जब निर्माण कार्य शीघ्र शुरू कराने के आदेश दिए तब मंत्रालय सक्रिय हुआ और आरडीबी इंडस्ट्रीज से इसका डिजाइन तैयार कराया. जिसे मंत्रालय की तकनीकी कमेटी ने मंजूरी दे दी है. निर्माण कार्य दो सालों में मुकम्मल करने का लक्ष्य रखा गया है. याचिका दायर करने वाली संस्था के महासचिव महेंद्र प्रसाद गुप्ता ने बताया कि विलंब के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार दोनों के ही अधिकारी समान रूप से कसूरवार हैं. उनके खिलाफ कार्रवायी होनी चाहिए. इसी के कारण लागत करीब तीन गुना बढ़कर 847 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी है. राजद नेता वीरेन्द्र कुमार ने कहा कि राज्य सरकार ने अभी तक जमीन को केन्द्र सरकार के नाम ट्रांसफर नहीं किया है. बिजली, पानी एवं सड़क भी मुहैया नहीं करायी गयी है. इससे योजना समय पर पूरा हो भी जायेगा इसमे संदेह ही है. ंपूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह षेखावत ने 3 जनवरी, 2004 को इसकी आधारशिला रखी थी. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत आठ राज्यों में एम्स का निर्माण किया जाना है जिनमें बिहार के अलावा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश शामिल हैं.

राजधानी में फिर पन्पा अपहृण उधोग

पटनाः राज्य में अचानक से बढ़े अपराध के कारण पुलिस महकमें की कारगुजारियों पर प्रष्न लगा दिया है. अपहरण जैसी वारदातों के बढ़ने से राज्य सरकार पर विरोधियों का प्रहार तेज हो गया है और क हीं न कहीं सुषासन का नारा हवा हवाई होता नजर आ रहा है.खैर गनीमत इस बात की है कि राजधानी के एक स्कूल से अपहृत कक्षा एक के छात्र श्रेष्ठ संजय को पुलिस ने सारण जिले से मुक्त करा कर उनके परिजनों को सकुषल पहुंचा दिया है पर इस घटना के उपरान्त बच्चों के अभिभावकों में असुरक्षा की भावना तो घर कर ही गयी है. यही कारण है कि अब अपने बच्चों को रिक्षा-टैम्पो चालकों के सहारे छोड़ने की बजाये वे खुद कार्यालयों से फुर्सत ले स्कूलों तक अपने बच्चों को साथ लाने के लिए पहुंच रहे हैं. यह राज्य सरकार के लिए गंभीर चुनौती है क्योंकि आज से चार साल साल पूर्व ला एण्ड आर्डर की स्थिति कुछ ऐसी ही थी जिसे मुद्दा बना राज्य की राजग सरकार राजग को उखाड़ फेंकने में सफल हो गयी थी. एडीजीपी हेडक्वाटर्स नीलमणि ने अपराधियों के चंगुल से बरामद श्रेष्ट को सारण जिले के बनियापुर के एक मकान में रखे जाने की बात कही है. वहीं से पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया है. क्राइस्ट चर्च स्कूल में कक्षा एक का छात्र श्रेष्ठ संजय उर्फ मोहित को उस समय अगवा किया गया था जब वह आटो से स्कूल जा रहा था. उसका आटो गांधी मैदान से गुजर ही रहा था तभी तीन मोटरसाइकिल सवार अपराधियों ने आटो को रोक लिया और श्रेष्ठ को लेकर फरार हो गए थे. श्रेष्ठ के पिता संजय श्रीवास्तव एक फार्मास्यूटिकल्स कंपनी में क्षेत्रीय प्रबंधक के पद पर कार्यरत बताये जाते हैं. श्रेष्ठ के घर लौटने से उसके परिजन तो खुष हैं ही साथ में पटना पुलिस ने भी राहत की सांस ही है.

उपचुनाव में दलबदलुओं को करारा झटका

पटनाः उपचुनाव में दलबदलुओं को जनता ने करारा झटका लगाया है. उप चुनावों के परिणाम अधिकांश स्थानों पर चैंकाने वाले रहे. लोकसभा चुनाव में औंधे मुंह गिरे राजद-लोजपा गठजोड़ ने दमदार वापसी की. इनकी ठण्डी पड़ी दुकानें फिर से सज गयी हैं. राजद से जदयू में गये बोचहां व फुलवारी शरीफ के विधायक रमई राम व श्याम रजक चुनाव हार गये. राजद ने दोनों सीटें बरकरार रखीं हैं. गौरतलब है कि इन दोनों नेताओं ने पिछले पन्द्रह सालों से राजद की राजनीति की थी और लालू यादव के खासमखास में से एक रहे थे. ऐसे में राजग कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के गले वे आसा नी से नहीं उतर रहे थे. यही कारण रहा कि कार्यकर्ताओं ने बेमन से प्रचार अभियान का संचालन किया और नतीजा सामने है. दूसरे यह कि पुराने परिसीमन के आधार पर हुए इस उपचुनाव में राजद के उम्मीदवारों के लिए यह क्षेत्र सेफ माना जा रहा था. जिसका लाभ राजद उम्मीदवार को मिला और फुलवारी और बोचहा दोनों जगह राजद उम्मीदवारों ने अपने पुराने दिग्गजों को पटखनी दे दी.फुलवारी विधानसभा क्षेत्र में जदयू के श्याम रजक को राजद के उदय मांझी ने कड़े मुकाबले में 1274 मतों से पराजित किया. मांझी को यहां 44,485 वोट मिले जबकि रजक 43,211 वोट पर सिमट गये. कांग्रेस के संजीव प्रसाद टोनी 19,406 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे जबकि भाकपा के अकलू पासवान को 5115 मतों से ही संतोष करना पड़ा.निर्दलीय दिलिप कुमार को 1825 और अरविन्द कुमार को 1115 मत मिले. पुराने परिसीमन पर हुए इस अंतिम चुनाव में ष्याम रजक को राजद छोड़ना महंगा पड़ा और वे चुनाव हार गये. उनके हार के पीछे कई कारण प्रमुख रहे. पहला यह कि राजद के साथ इतने लम्बे समय तक रहने के बाद राजद को बुरे दिनों में छोड़कर जदयू में भागना उनके क्षेत्र के मतदाताओं को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इसे अवसरवादिता की श्रेणी में रखते हुए उनके खिलाफ मत दे दिया जिस कारण उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. दल-बदलने का खामियाजा रमई राम को भी भुगतना पड़ा. वे लोकसभा चुनाव में राजद का टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस की टिकट पर गोपालगंज से चुनाव लड़े और हार गये. फिर उन्होंने जदयू का दामन थाम लिया और बोचहा से विधानसभा उपचुनाव लड़े जहां उन्हें राजद के उम्मीदवार मुसाफिर पासवान ने 4026 मतों के अन्तर से परास्त कर दिया.

इस झटके से उबरने में लगेगा समय

शमशाद पटनाः अभी मई में राजग खेमे में लोकसभा की 33 सीटों पर जीत हासिल करने के जष्न की छमाही भी पूरी नहीं हुई कि विधानसभा उपचुनाव में उनका सारा मजा काफूर हो गया. यह क्या 18 में से नौ सीटों को राजद-लोजपा गठबंधन ने जीत लिया जबकि इनमें से ज्यादातर सीटें राजग की ही थी. यह कमाल कैसे हुआ. क्यों इस चुनाव में नीतीष-मोदी का जादू नहीं चला और क्यों राजद-लोजपा का पुर्नजन्म हुआ. खतरा यह है कि विधानसभा उपचुनावों के 18 सीटों के परिणामों से जब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उबरेंगे तब तक फाइनल मुकाबले की घड़ी आ जायेगी. यही कारण है कि राजग की इस करारी हार को राजद-लोजपा के लिए संजीवनी माना जा रहा है. अठारह में से नौ सीटों पर जीत के बाद राजद लोजपा कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह देखने से तो यही लगता है कि वे आगामी विघानसभा चुनाव में अभी से अपनी फतह मान लिये हंै दूसरी ओर राजग खेमे में घोर उदासी है.परिणाम को एक दूसरे पर थोपा-थोपी का सिलसिला अलग प्रारम्भ हो गया है.मुख्यमंत्री के कार्यकलापों पर भी प्रष्नचिन्ह लगाये जा रहे. हार के पीछे टिकटों के बंटवारे और बदबदलुओं को प्रश्रय देने पर भी निषाना साधा जा रहा है. कुल मिलाकर देखा जाए तो राजग उहापोह की स्थिति में है.आत्ममंथन जदयू और भाजपा दोनों खेमे में किया जा रहा है कि सुषासन में कहां चूक हुई कि जनता ने उन्हें ऐसा झटका दिया. फटे को रफू के प्रयास प्रारम्भ कर दिये गये हैं ताकि आगे सब ठीक ठाक रहे.बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है.18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं. दूसरी तरफ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं. राज्य में राजनीतिक हाषिये पर चली गयी कांग्रेस ने जदयू की दो सीटों को अपने कब्जे में कर दमदार वापसी की है. बहुजन समाज पार्टी ने भी एक सीट ले कर सबको चैंका दिया है जबकि निर्दलीय उम्मीदवार को एक सीट मिली है.बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था. रामविलास पासवान की लोजपा का तो सूपरा ही साफ हो गया था. स्वयं रामविलास पासवान चुनाव हार गये थे.इसके मद्देनजर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफी चैंकाने वाले हैं.कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की खामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं. राजग द्वारा टिकटों के बंटवारे में परिवारवाद को नकारने को भी हार के एक कारण के रूप में देखा जा रहा है. क्योंकि जिन सांसदों ने अपने परिजनों के लिए टिकट मांगे थे नहीं मिलने पर वे राजग द्वारा भेजे गये उम्मीदवारों को हराने में जुट गये. घोसी में तो सांसद जगदीष षर्मा ने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतार दिया और वे जीती भी. इस प्रकार उपचुनाव में राजग को अपनों के भीतरघात का भी सामना करना पड़ा. राजग के खिलाफ उनके दल के नेताओं का गुस्सा यूं ही नहीं है. जदयू के नेताओं का ही आरोप है कि फरवरी 2005 के उन दिनों को याद करें जब राज्य में नीतीष कुमार के नेतृत्व में सरकार बननी थी पर राजद के दबाव में राज्य में राष्ट्रपति षासन लागू कर दिया गया और बूटा सिंह को राज्य की कमान सौंप गयी थी. तब लोजपा तोड़कर नागमणि, नरेन्द सिंह जैसे नेताओं ने जदयू में षामिल होकर नीतीष कुमार को षक्ति प्रदान की थी. प्रभूनाथ सिंह, दिग्विजय सिंह,डा.मोनाजिर हसन, उपेन्द्र कुषवाहा जैसे नेता जदयू में पहले से ही मौजूद थे. नवम्बर 2005 में फिर से चुनाव हुए और राजग की सरकार बनी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीष कुमार विराजमान हुए. पर जैसे जैसे समय बितता गया नीतीष कुमार जदयू में मौजूद विभिन्न जाति के कद्दावर नेताओं का कद छोटा करना प्रारम्भ किया. पहले षिकार उपेन्द्र प्रसाद कुषवाहा हुए. जार्ज को अध्यक्ष पद से जलील कर हटाया गया. उसके बाद डा.मोनाजिर हसन से भवन निर्माण विभाग वापस ले लिया गया जबकि 2009 के लोकसभा के चुनाव में जार्ज फर्नांडीस, दिगिवजय सिंह और बेटिकट कर दिया गया जबकि प्रभूनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में वे प्रचार करने तक नहीं गये. इससे जदयू के आधार मतदाताओं में गलत संदेष चला गया परिणामस्वरूप प्रभूनाथ सिंह चुनाव हार गये. दिग्विजय सिंह का टिकट काटने और प्रभूनाथ सिंह के चुनाव प्रचार में न जाने को राजपूत मतदाताओं ने गंभीरता से लिया और मौके की तलाष में रहे. नजदीक में उपचुनाव मिल गया और उन्होंने अपना विरोध राजग के उम्मीदवारों के खिलाफ मत दे कर किया.कुछ यही स्थिति कुषवाहा नेताओं के साथ हुआ. उपेन्द्र कुषवाहा और नागमणी ने इस चुनाव में अहम रौल अदा किया. इसके अलावे सांसद बने विधायकों की पसंद को नजर अंदाज कर अन्य उम्मीदवारों को टिकट थमा देने के कारण स्थिति विस्फोटक हो गयी. मुंगेर में डा.मोनाजिर हसन की पसन्द के उम्मीदवार को ऐन वक्त पर टिकट से वंचित करने के कारण वे चुनाव प्रचार से अलग हो गये और मुंगेर गये ही नहीं जिससे वहां से जदयू उम्मीदवार हार गया और राजद उम्मीदवार की जीत हुई.नीतीष कुमार ने मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए कई अच्छे काम भी प्रारम्भ किये पर दूसरी ओर जदयू के पुराने व जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं का पर कतरना भी प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर वैसे जनाधारविहीन मुस्लिम नेताओं की जदयू में पूछ बढ़ा दी जो कभी चुनाव लड़े ही नहीं थे. इनमें अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष नौषाद अहमद, गुलाम रसूल वलियावी आदि को अनावष्यक तरजीह देने से जदयू के पुराने मुस्लिम नेताओं में आक्रोष बढ़ना प्रारम्भ हुआ और उनलोगों ने दल की गतिविधियों से खुद को अलग थलग करना प्रारम्भ कर दिया. इसे भी हार के मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है. उधर अन्य दलों से आये दलबदलुओं को जदयू में तरजीह दिये जाने के कारण मतदाताओं ने वैसे नेताओं के खिलाफ मत दिया परिणामस्वरूप फुलवारीशरीफ विधानसभा क्षेत्र से श्याम रजक और बोचहा से रमई राम चुनाव हार गये. उपचुनाव में हार का कारण बटाईदारी बिल का प्रचारित होना भी एक कारण माना जा रहा है जिससे गांव के किसान राजग के खिलाफ हो गये और समय रहते नीतीष कुमार से पल्ला झाड़ने में अपनी भलाई समझी और उन्होंने सत्ता के सेमी फाइनल में सरकार को यह जता दिया है कि कार्यसंस्कृति में बदलाव नहीं हुआ तो वे सरकार को ही बदल देंगे.उधर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार ने चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनके आधार मतों में कांग्रेस ने सेंधमारी कर ली जिससे राजद-लोजपा उम्मीदवारों को लाभ मिला साथ ही स्थानीय कारण भी इस उपचुनाव में हावी रहे दूसरी तरफ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित पुराने अंदाज में कहा कि सेमी फाइनल में जीत के बाद अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी.

शनिवार, 12 सितंबर 2009

फुलवारी में नहीं टूट रही मतदाताओं की चुप्पी

पटना: फुलवारीशरीफ विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं की चुप्पी सभी उम्मीदवारों को परेशान किये हुए है. ऐसे में इस बार अपनी जीत के लिए श्याम रजक को पापड़ बेलने पर रहे हैं. उन्हें कड़ी टक्कर राजद के उदय मांझी से मिल रही है. फुलवारी विधानसभा क्षेत्र में मांझी मतदाताओं की संख्या चालीस हजार के आसपास है और इसी वर्ग से उदय को राजद ने उम्मीदवारी सौंप दी है. इससे जदयू उम्मीदवार की परेषानी बढ़ गयी है उपर से कांग्रेस के संजीव प्रसाद टोनी का दबाव अलग है. परिणाम क्या होगा इस बारे में कोई दावे से नहीं कह सकता. दारोमदार सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं के रुख पर है वे जिधर जायेंगे पलड़ा उस उम्मीदवार की ओर झुक जायेगा. मुसलमानों का रुख इस बार पूरी तरह साफ नहीं दिख रहा है. रमजान के कारण वे चुप्पी साधे हुए हैं. राजद, जदयू और कांग्रेस इस वोट बैंक को रिझाने में लगा है. माले के अकलू राम की भी नजर इस वोट बैंक पर है. ऐसे में इस बार फंुलवारी विधानसभा क्षेत्र की राजनीति रोचक बन गयी है. यहां से राजद और जदयू ने अपने पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट न देकर दूसरे दल से आये नेताओं को उम्मीदवारी सौंपी है. जिससे दोनों उम्मीदवारों को नये मतदाताओं से रुबरु होना पड़ रहा है जिस कारण उन्हें मतदाताओं के मिजाज को समझने में परेषानी हो रही है. पुराने परिसीमन पर अंतिम बार हो रहे इस उपचुनाव में राजद अपनी पूरी ताकत झोंके हुआ है कारण अभी क्षेत्र उसके उपयुक्त है. नये परिसीमन में उसे परेषानी हो सकती है क्योकि आधार मतों में पुनपुन के जुड़ जाने से जदयू का पलड़ा भारी पड़़ सकता है. वैसे इस बार जदयू उम्मीदवार एन्टी इनकमवेन्सी फैक्टर से जूझ रहे हैं. जिसे वे पाटने में असफल रहे तो चुनाव का परिणाम उनके विपरित भी जा सकता है. मतदाता उनके सरोकारों से दूर रहने के कारण उनसे खफा है. जिसका लाभ राजद उम्मीदवार को मिलता दिख रहा है. चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री नीतीष कुमार को खुद ष्याम रजक के खिलाफ जनता के जनाक्रोष को कई जगह झेलना पड़ा है. हालांकि नाराज जनता की नाराजगी को कम करने के लिए नीतीष कुमार ने पुरानी बातों को भूलने का आग्रह किया है और ष्याम को नहीं उन्हें वोट देने को कहा है. अब इसका कितना प्रभाव पड़ा है यह तो 15 सितम्बर को वोट वाले दिन ही दिखेगा. उधर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान संयुक्त रुप से चुनावी सभाओं को सम्बोधित कर चुके हैं उनका रोड षो भी हुआ जिसमें भारी संख्या में स्थानीय लोगों ने भी भाग लिया. मतदाताओं ने उनका जगह जगह स्वागत भी किया. नीतीष भी रोड षो में उतरे और मतदाताओं ने जदयू उम्मीदवार को सफल बनाने का आग्रह किया है.

राष्ट्रीय पोषण अभियान बिहार में फेल

पटनाः केन्द्र सरकार द्वारा राषि उपलब्ध कराये जाने के बावजूद राज्य सरकार के अधिकारियों की लेट लतीफी के कारण राषि खर्च नहीं हो पा रहा जिससे गरीब बच्चे सरकारी योजनाओं के लाभ से उपेक्षित हैं.अब पोषक सहायता राषि के आवंटन और व्यय को देखने से तो यही लगता है कि राज्य के अधिकारियों की लापरवाही के कारण केन्द्र द्वारा भेजे गये करोड़ो रुपये यूं ही पड़े रह गये पर गरीब किषोरियों को योजना का लाभ नहीं पहुंचाया जा सका. कैग ने राज्य सरकार के अधिकारियों की इस लापरवाही पर गहरा ऐतराज व्यक्त किया है. मामला औरंगावाद और गया जिले से जुड़ा है.राष्ट्रीय पोषाहार अभियान के अन्तर्गत किषोरी बालिकाओं के लिए पोषाहार योजना नाम से पायलट परियोजना राज्य के दो जिलों औरंगावाद और गया जिले में अगस्त 2002 में प्रारम्भ हुई. परियोजना के निर्देषानुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के किषोरी वालिकाओं और गर्भवती एवं षिषुवती माताओं को कुपोषण, सुक्ष्मपोषक की कमियों और पिछड़े जिलों जहां बालिकाओं और औरतों में कुपोषण थी में चिरकालिक उर्जा कमियों को कम करने के लिए प्रारंभिक रूप से तीन माह की अवधि के लिए 6 किलो अनाज प्रति लाभुकों को प्रति माह मुत दिया जाना था.लाभुक जो व्यवरूछेद वजन क्रमषः 35 और 40 किलो प्राप्त कर लिये तीन महीने के बाद अनाज नहीं प्राप्त करेंगे परन्तु उन लाभुकों के मामले में जो कम वजन के रहेंगे अनाज प्राप्त करते रहेंगे. इस योजना को बाल विकास परियोजना पदाधिकारी और जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम पदाधिकारी या जिला कल्याण पदाधिकारी के माध्यम से लागू किया जाना था पर ऐसा हुआ नहीं. जबकि इस योजना को जारी रखने के लिए केन्द्र सरकार ने मार्च 2004 और मार्च 2006 में दोनों जिलों के लिए निदेषालय आईसीडीएस, समाज कल्याण विभाग बिहार के माध्यम से 12.41 करोड़ रुपये विषेष रुप से अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता प्रदान किया.उसमें से दोनों कजले के कल्याण पदाधिकारी ने 6.58 करोड़ रुपये प्रत्येक 3.29 करोड़ रुपये प्रत्येक भारतीय खाद निगम एफसीआई गया को 11,100 मि.टन अनाज प्राप्त करने के लिए और 20.35 लाख रुपये हरेक जिले के राज्य खाद्य निगम को अनाज एफसीआई से उनके गोदाम में लाने का परिवहन मूल्य को चुकाने के लिए अग्रिम जून 2005 को दिया.नवम्बर 2008 तक एसएफसी औरंगावाद ने 530.12 मि.टन और एसएफसी गया ने 1274.16 मि.टन खाद्यान्न गेहूं का एफसीआई से उठाव किया था. जबकि इस कार्यक्रम के अन्तर्गत औरंगावाद में 31959 लाभुकों और गया में 73116 लाभुकों की पहचान की गयी थी. जिनके लिए 191.8 मि.टन और 365.6 मि.टन खाद्यान्न प्रतिमाह की जरूरत थी.5550 मि.टन के लिये अग्रिम और पूर्वोक्त मात्रा में खाद्यान्न आवष्यकता के विरूद्ध बाल विकास परियोजना पदाधिकारी औरंगावाद केवल 64.23 मि.टन खाद्यान्न चावल 43.72 मि.टन और गेहूं 20.51 मि.टन जो एक महीने के लिए भी पर्याप्त नहीं था का उठाव किया जबकि वाल विकास परियोजना पदाधिकारी गया 1007.89 मि.टन गेहूं विगत दो साल 2005-07 की अवधि में उठाव किया. इस प्रकार दोनों जिले में निधि उपलब्ध रहने के बावजूद खाद्यान्न का उठाव नहीं हो पाया जिससे वे इस कार्यक्रम को लागू करने में असफल रहे और विषेष अतिरिक्त सहायता के रूप में उपलब्ध कराये गये 12.42 करोड़ रुपये में से केवल 60 लाख रुपये यानि 4.83 प्रतिषत ही खर्च कर सके. परिणामस्वरूप एफसीआई व एसएफसी तथा जिला कल्याण पदाधिकारी के पास 11.82 करोड़ रुपये दो से चार वर्षों तक अवरूद्ध रहा पर एनपीएजी का लाभुकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका.जिससे राष्ट्रीय पोषण अभियान योजना का राज्य में वांछित उद्देष्य प्राप्त नहीं किया जा सका. कैग ने इस पर गहरी आपत्ति जतायी है और इस योजना से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवायी के लिए राज्य सरकार को अप्रैल 2008 में ही लिखा था पर सरकार ने दिसम्बर 2008 तक कोई कार्रवाई की सूचना कैग उपलब्ध नहीं करा पायी थी जबकि यह एक गंभीर मामला था.