शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
कोई खैरा का यह दर्द समझने क्यों नहीं आता
प्रदेश के मुंगेर जिले खैरा गांव में आजादी के 63 वर्षोंं के बाद भी शुद्घ पेयजल की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है यहां के पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा विश्व मानदंड से दस गुनी अधिक है. परिणाम स्वरूपम यहां आज भी बच्चे लंगड़े व अपंग पैदा हो रहे हैं. खैरा में पेयजल की समस्या को दूर करने के लिये अब तक करोड़ो रूपये खर्च भी हुए पर अभी तक कोई परियोजना कारगर साबित नहीं हो पायी है जिससे यहां के ग्रामीणों को शुद्घ पेयजल नसीब हो. 75 लाख रुपये खर्च तक वाटर टैंक लगाने की योजना प्रारंभ हुई योजना पूर्ण भी हुआ पर तकनीकी आधार पर त्रुटि के कारण यह परियोजना भी फेल हो गयी इतनी राशि खर्च होने के बाद भी इस नलकूप परियोजना से प्राप्त पानी में अर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा नियंत्रित नहीं हो पायी. परिणामस्वरूप इस परियोजना को बन्द कर दिया गया. सिर्फ खैरा ही नहीं मुंगेर जिले के खडग़पुर अनुमंडल के आस-पास के गांवों व गर्म झील के पानी में रेडियो एक्टिव मेटेरियल रेडाल की मौजूदगी से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया जाता है. बावजूद इसके पूरे अनुमंडल क्षेत्र में, पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा सकी है. खैरा की स्थिति का जायजा लेने तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम भी पहूंची थी और वहां की पानी की जांचोपरांत पीने के अयोग्य करार दे दिया था. खैरा की स्थिति तो यह है कि ग्रामीण, राजनेताओं को गांव में घुसने नहीं दे रहे. गत विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी वादों में खैरा के पेयजल आपूर्ति की समस्या को दूर करने की घोषणा की थी पर इसके लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस प्रयास नहीं किये जाने पर ग्रामीणों में वर्ष 2008 में ग्रामीणों ने स्थानीय जदयू विधायक अनन्त कुमार सत्यार्थी को गांव में प्रवेश करने पर उनका जमकर विरोध कर दिया था. जिस पर विधायक अनन्त कुमार सत्यार्थी ने भी ग्रामीणें की शिकायत को जायज ठहराते हुए जिले के आला अफसरों पर इस समस्या के प्रति विमुख होने का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार से इस पर पहल करने की मांग की थी. इसके बावजूद खैरा एवं आसपास के इलाके के पेयजल की समस्या को हल करने के प्रति सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयास प्रारंभ नहीं किये गये हैं. जिससे यहां के ग्रामीण आर्सेनिक व फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर है. परिणामस्वरूप यहां जन्म लेने वाला बच्चा आज भी अपंग पैदा हो रहा है.
इस तरह कट रहा हमारा डॉल्फिन
मो.शमशाद आलम
: गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित कर दिये जाने से इस जीव के विलुप्त होने के खतरे पर अब शायद अंकुश लग जाए. पर सिर्फ घोषणा मात्र से इसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि यह जीव अपनी मौत नहीं मर रहा बल्कि उन्हें उंची कीमत के लोभ में गंगा की तटों पर बसे लोग व मछुआरे मार रहे हैं. आज भी मुंगेर, सुल्तानगंज एवं भागलपुर के बाजार में गंगा डॉल्फिन की चर्बी पांच सौ रूपये प्रति किलो की दर से खुलेआम बेची जा रही है. 5 अक्तूवर के बाद से हालांकि स्थिति कुछ बदली है. 6 अक्तूवर तक सभी समाचार पत्रों में गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जीव घोषित किये जाने की खबर को पढऩे के बाद इस जीव को गंगा नदी में मारकर खुलेआम बेचने वाले लोग चौकन्ना हो गये हैं. बिहार के, मुंगेर, सुल्तानगंज के आसपास गंगा नदी में गंगा डाल्फिन पायी जाती हें. गंगा के तटीय इलाके के लोग इसे सोंस के नाम से जानते हैं. एक सर्वे के मुताबिक गंगा नदी में अब सिर्फ 700 से 800 डाल्फिन शेष रह गयी हैं. जिस तेजी से इस जीव का मारा जा रहा है इसे नहीं बचाया गया तो यह विलुप्त हो ही जाता. इसे देखते हुए इसे सही समय पर राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है. अब इसे मारने वाले के साथ-साथ इसका अन्य रूप में उपयोग करने वाले भी दंडित होंगे. पर इसके लिए सरकारी तंत्र को ईमानदार पहल करनी पड़ेगी, क्योंकि गंगा डाल्फिन की चर्बी का उपयोग मछुआरे बचवा मछली पकडऩे में चारे के रूप में प्रयोग करते हैं.ऐसे में राष्टï्रीय पक्षी मोर और राष्टï्रीय पशु बाघ की रक्षा की तुलना में इस जीव की सुरक्षा काफी कठिन होगी. जिसके लिए अलग से टास्क फोर्स बनाकर ही इस जीव की रक्षा संभव है अन्यथा इसका अवैध शिकार निरंतर जारी रहेगा और एक दिन चीन की ही तरह यहां से भी यह विलुप्त हो जायेगा. इसलिये इस जीव को विलुप्त होने से बचाने का एक ही उपाय है, कि मछूआरों और गंगा के तटीय क्षेत्र में बसे लोगों को इस जीव के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए साथ ही उनके बीच इस बात को भी प्रचारित कराया जाए कि सोंस को गंगा की सवारी माना जाता है, जिसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है.इस बात के प्रचारित होने से धर्म प्रेमी सज्जन इसे मारने से बचेंगे साथ में लोगों को भी इससे रोकेंगे.
: गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित कर दिये जाने से इस जीव के विलुप्त होने के खतरे पर अब शायद अंकुश लग जाए. पर सिर्फ घोषणा मात्र से इसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि यह जीव अपनी मौत नहीं मर रहा बल्कि उन्हें उंची कीमत के लोभ में गंगा की तटों पर बसे लोग व मछुआरे मार रहे हैं. आज भी मुंगेर, सुल्तानगंज एवं भागलपुर के बाजार में गंगा डॉल्फिन की चर्बी पांच सौ रूपये प्रति किलो की दर से खुलेआम बेची जा रही है. 5 अक्तूवर के बाद से हालांकि स्थिति कुछ बदली है. 6 अक्तूवर तक सभी समाचार पत्रों में गंगा डॉल्फिन को राष्टï्रीय जीव घोषित किये जाने की खबर को पढऩे के बाद इस जीव को गंगा नदी में मारकर खुलेआम बेचने वाले लोग चौकन्ना हो गये हैं. बिहार के, मुंगेर, सुल्तानगंज के आसपास गंगा नदी में गंगा डाल्फिन पायी जाती हें. गंगा के तटीय इलाके के लोग इसे सोंस के नाम से जानते हैं. एक सर्वे के मुताबिक गंगा नदी में अब सिर्फ 700 से 800 डाल्फिन शेष रह गयी हैं. जिस तेजी से इस जीव का मारा जा रहा है इसे नहीं बचाया गया तो यह विलुप्त हो ही जाता. इसे देखते हुए इसे सही समय पर राष्टï्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है. अब इसे मारने वाले के साथ-साथ इसका अन्य रूप में उपयोग करने वाले भी दंडित होंगे. पर इसके लिए सरकारी तंत्र को ईमानदार पहल करनी पड़ेगी, क्योंकि गंगा डाल्फिन की चर्बी का उपयोग मछुआरे बचवा मछली पकडऩे में चारे के रूप में प्रयोग करते हैं.ऐसे में राष्टï्रीय पक्षी मोर और राष्टï्रीय पशु बाघ की रक्षा की तुलना में इस जीव की सुरक्षा काफी कठिन होगी. जिसके लिए अलग से टास्क फोर्स बनाकर ही इस जीव की रक्षा संभव है अन्यथा इसका अवैध शिकार निरंतर जारी रहेगा और एक दिन चीन की ही तरह यहां से भी यह विलुप्त हो जायेगा. इसलिये इस जीव को विलुप्त होने से बचाने का एक ही उपाय है, कि मछूआरों और गंगा के तटीय क्षेत्र में बसे लोगों को इस जीव के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए साथ ही उनके बीच इस बात को भी प्रचारित कराया जाए कि सोंस को गंगा की सवारी माना जाता है, जिसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है.इस बात के प्रचारित होने से धर्म प्रेमी सज्जन इसे मारने से बचेंगे साथ में लोगों को भी इससे रोकेंगे.
औषधि जांच मशीन सात वर्षों तक पड़ी रही
औषधि नियंत्रण विभाग के आलाधिकारियों एवं नकली दवा निर्माताओं की सांठ-गांठ के कारण पटना स्थित औषधि प्रयोगशाला में मशीन आ जाने के बावजूद अब तक हाई परफारमेंस लिक्विड को मेटोग्राफी (एच.पी.एल.सी) मशीन स्थापित नहीं हो पाया है, जबकि भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला (बीडीसीएल) अगमकुंआ, पटना को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए 10.18 लाख रुपये की लागत वाली यह मशीन सितम्बर 2002 में ही उपलब्ध करा दी थी. जिस पर इसके बावजूद सात वर्षों तक मशीन यूं ही पड़ी रही कैग ने गंभीर आपत्ति जताते हुए सरकार से स्पष्टïीकरण तलब किया है. राज्य की पिछली राजद सरकार के कार्यकाल, सितम्बर 2002 में ही भारत सरकार ने बिहार औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला को सुक्ष्मजीवी दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए हाई परफारमेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी मशीन प्रदान किया था. पर इसे स्थापित करने के लिए स्वास्थ्य निदेशालय ने बीडीसीएल को 15.43 लाख रुपये प्रयोगशाला के नवीकरण एवं मशीन की स्थापना के लिए जून 2007 में उपलब्ध कराया इस राशि में से बीडीसीएल ने, 3.95 लाख रुपये कार्यपालक अभियंता, पी.डब्लूडी को विद्युत कार्य के लिए और 4.07 लाख रुपये खाद्य प्रयोगशाला के सिविल कार्य के लिए उपलब्ध कराया था जबकि सिविल कार्य के प्राक्कलन की स्वीकृति आदेश की प्रत्याशा में विभाग ने 7.41 लाख रुपये की राशि को बैंक में जमा रखा. उधर विभाग ने जुलाई 2008 तक प्राक्कलन को स्वीकृत नहीं किया था. इस प्रकार औषधि परीक्षण प्रयोगशाला के भवन का सिविल व मरम्मत कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया. इतना ही नहीं विद्युत कार्य भी प्रारंभ नहीं हो सका. इसके लिए औषधि नियंत्रण प्रयोगशाला ने कोई पहल भी नहीं और न ही खाद्य प्रयोगशाला के संबंध में सिविल कार्य का अनुश्रवण ही किया इसके बावजूद बीडीसीएल के प्रभारी अधिकारी में जुलाई 2008 में मशीन करने परिचालन में बता कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया जिस पर कैग ने, आपत्ति जताते हुए उनका जवाब स्वीकार्य नहीं किया उनका तर्क था कि कोई सिविल या विद्युत कार्य प्रारम्भ नहीं किया फिर किस प्रकार मशीन कार्य करने लगा. प्रभारी अधिकारी ने अक्टूबर 2008 में कैग को फिर सूचित किया कि प्रशिक्षित स्टाफ की अनुपलब्धता के कारण औषधि प्रशिक्षण नहीं हो सका जिसके लिए विभाग से पत्राचार किया गया फिर भी प्रीाारी आधारभूत संरचना की स्थिति एवं मशीन के परिचालन के बारे में व मौन रहे प्रभारी का जवाब कि मशीन का कोई परीक्षण कार्य नहीं किया गया इस बात को ठोस करता है कि मशीन निष्क्रिय था. इस प्रकार सात वर्ष पहले 2002 में भारत सरकार द्वारा जो मशीन प्रदान किया गया था उसे छह वर्ष बाद 2008 तक भी स्थापित एवं प्रचालित नहीं किया जा सका. परिणामस्वरूप औषधि परीक्षण के वांछित उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया जा सका और मशीन के साथ-साथ निधि भी अवरूद्घ रहा. कैग ने पूरे प्रकरण को साभार के समक्ष रखते हुए जवाब तलब किया है, पर सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली है.
हैण्ड पम्पों की मरम्मती के नाम पर डकार गये 91 लाख
पटना : ग्राम पंचायतों में हैण्ड पम्मों की मरम्मत एवं मरम्मत के साथ-साथ सफाई सुविधा के नाम पर 91.06 लाख रुपये की राशि का बंदरबांट किया गया. जिसके जांच के आदेश दिये गये हैं. मामला पीएचइडी मधेपुरा का है. यहां के कार्यपालक अभियंता पीएचइडी को 2001 से 2005 की अवधि में 12 प्रखण्डों के अंतर्गत 170 ग्राम पंचायतों को हैण्ड पंपों (एचपी) की स्थापना, साधारण मरम्मति, विशेष मरम्मति और सुलभ शौचालय को बनाने के लिए अग्रिम राशि के रूप में 91 लाख छह हजार रुपये उपलब्ध कराये गये. पंचायतों को मद बार खर्चों का विवरणी प्रत्येक अगले माह की 5 तारीख को और भौतिक और वित्तीय सफलताओं की मासिक व त्रैमासिक प्रगति प्रतिवेदन संबंधित कार्यपालक अभियंता को देना आवश्यक था साथ ही पंचायत द्वारा संधारित स्थल, लेखा बही संबंधित प्रमण्डलों द्वारा जांच किया जाना था पर ऐसा हुआ नहीं इसका खुलासा मार्च 2008 में जांच के दौरान हुआ डी.सी. विपत्र में न तो खर्च की विवरणी है और न ही 91.06 लाख रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र ही तीन से छह वर्ष बीतनेक के बाद भी प्रस्तुत किया गया. जून 2008 में इस संदर्भ में कैग ने मामले की उजागर किया. न तो कनीय अभियंता और न ही सहायक अभियंता ने स्थल लेखा पंजी को जांचा. इस संदर्भ में राज्य सरकार ने उपयोगिता प्रमाण पत्र की प्रस्तुति सुनिश्चित करने हेतु ठोस और प्रभावी कदमों को लेने के लिए उपविकास आयुक्त डीडीसी एवं अन्य क्षेत्रीय अधिकारियों को आवश्यक निर्देश निर्गत करने के लिए जिलाधिकारी मधेपुरा को लिखा बावजूद इनके उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं प्रस्तुत किया गया. परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने 2005-06 के लिए निधि की स्वीकृति नहीं दी. जुलाई 2008 में कार्यपालक अभियंता पीएचइडी मधेपुरा ने जवाब दिया कि उपयोगिता प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु संबंधित पंचायतों को लिखा गया है पर उनका जवाब प्राप्त नहीं हुआ है. इतने के अलावे, संबंधित पंचायत के मुखिया एवं पंचायत सेवकों के विरूद्घ कोई अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई. साथ ही विभाग योजना निधि की राशि 91 लाख छह हजार रुपये की उपयोगिता सुनिश्चित करने में विफल रहा. स्थल लेखा का जे.ई. और ए.ई. द्वारा जांच के बिना यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका कि काम वास्तव में पूरा किया गया है. कैग ने इस मामले को सरकार को प्रतिवेदित कर दिया है. पर पीएचइडी ने इस प्रकरण ने ठोस कार्रवायी नहीं की है.
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