सोमवार, 25 जनवरी 2010

राहत महसूस कर रहे विछुब्ध कांग्रेसी

पटना : कांग्रेस की सूची जारी होते ही राज्य कांग्रेस के बड़े नेताओं में खलबली मच गयी है. पुराने कद्दावर कांग्रेसी नेताओं ने राज्य संगठन प्रभारी जगदीश टाईटलर पर भी कमान तान दी है. उनका मानना है कि संगठन प्रभारी पार्टी बन गये हैं जबकि उन्हें न्यूट्रल रहना चाहिए था. विछुब्ध चल रहे कांग्रेसियों भी पूरी तरह मन बनाये हुए हैं. वे किसी कीमत पर काम्प्रमाईज के मूड में नहीं हैं.उन्होंने ने तो यहां तक कह डाला कि कितनों को टाईटलर पार्टी से निकालेंगे.इस प्रकार की लगातार बयानबाजी से पार्टी की साख को बट्टा लगता देख टाईटलर समझौते के मूड में हैं.उन्होंने विछुब्ध कांग्रेसियों की अब सुनने की बात की है. इससे विछुब्ध गुट के सदस्य राहत महसूस रहे हैं. उन्हें राहुल गांधी के बिहार दौरे का इंतेजार है. वे राहुल के सामने क्या करेंगे और कहेंगे इसे गुप्त रखा गया है.उधर टाईटलर और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा के बारे में कांग्रेस विधायक खुरर्शीद आलम की टिप्पणी के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है. उनसे एक सप्ताह के अन्दर जवाब देने को कहा गया है.जवाब आने के बाद ही उनके भविष्य के बारे में आगे की रणनीति तय होगी. वैसे कायदे से देखा जाए तो अभी कांग्रेस तोडऩे से ज्यादा जोडऩे पर ध्यान लगाये हुए है इससे यह समझा जा रहा है कि विधायक खुर्शीद आलम के मामले में कांग्रेस बीच का रास्ता ही अपनायेगी.पर यह डिपेन्ड इस बात पर भी करता है कि वे नोटिस का जवाब कैसा देते हैं. पर उनका तेबर देखने से तो यही लगता है कि वे आर पार की लड़ाई के मूड में हैं. उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के स्पष्टीकरण पर उन्हे वकालतन नोटिस भेजा है जिसमें उन्हे मांसिक रूप से दिवालिया कहने पर एतराज व्यक्त किया है. कांग्रेस अभी पूरे बिहार में युवा कांग्रेस का सदस्यता अभियान चला रही है. ऐसे समय में पार्टी किसी विवाद में पडऩा नहीं चाहेगी.पहले ही कांग्रेस कार्यसमिति की सूची में मीरा कुमार के नाम के सामने उनकी जाति का उल्लेख कर पार्टी की पूरे देश में किरकिरी हो चुकी है. जिसके लिए कांग्रेस की राष्टï्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी तक को स्पष्टïीकरण देना पड़ा था साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा और संगठन प्रभारी जगदीश टाईटलर के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है.अब देखना यह है कि राहुल गांधी अपने बिहार दौरे के दौरान विछुब्ध गुट के नेताओं को समेटने में कामयाब होते है या विछुब्धों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं.

जद यू का विवाद बढ़ा

पटना : पांचवें साल में प्रवेश करते ही सत्ताधारी दल राजग में यह क्या हो रहा है? अमूमन यह देखा जाता है कि नेता चुनावी साल में सरकार की उपलब्धियों से आमजन को रूबरू कराने में जुट जाते हैं पर यहां तो मामला पूरी तरह उलटा दिखायी दे रहा है. जदयू के नेता आपस में लडऩे लग गये हैं. विपक्षी दलों पर प्रहार करने की बजाय खुद अपने ही दल की खामियों को सरेआम करने में जुटे हैं. इनमें कई बड़े नेता शामिल हैं. जो पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रहे है.ं उनका मानना है कि दल ने जब उनकी चिन्ता छोड़ दी तो वे पार्टी की जड़ें क्यों नहीं कुरेदें? माल महाराज का और मिरजा खेले होली यह ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है.19 जनवरी को प्रभूनाथ सिंह ने नीतीश कुमार के खिलाफ पटना में जमकर अपनी भड़ास निकाली. यह तो झांकी है. जदयू के कई सांसदों के बारे में कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस के टच में हैं. उन्हें इंतजार बस पर्याप्त संख्या और डील के पूरा होने का है. भाजपा नेता राणा ऋषिदेव अलग खफ चल रहे हैं. जदयू के एक राज्यसभा सदस्य अपनी पार्टी से खफा चल रहे हैं. यह जदयू के साथ क्या हो रहा. खुद जदयू से जुड़े नेताओं को समझ में नहीं आ रहा कि कैसे इन नेताओं के गुस्से को विराम दिया जाए. अब तो जदयू के नेता ही सरकार और मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर उंगली उठाने लगे हैं. उधर जदयू से निष्कासित उपेंद्र कुशवाहा और रामबिहारी सिंह को जदयू में फिर वापस लाने के निर्णय से पहले उनसे सलाह तक नहीं किये जाने के कारण नाराज प्रदेश जदयू अध्यक्ष की नाराजगी अब सतह पर आ गयी है. जिसका इजहार वे खास बैठकी में खुलेआम कर रहे हैं. वे भी सही समय का इंतजार कर रहे हैं. उनके खफा होने की एक वजह और भी है. वह यह कि उनके एक स्वजातीय नेता को फिर से दल में वापस लाने की कवायद तेज कर दी गयी है जो अभी कांग्रेस में हैं. गत लोकसभा चुनाव वे कांग्रेस की टिकट पर लड़े थे. परिवारवाद को रोकने के प्रयास के कारण गत लोकसभा चुनाव में सांसद की राय को नजरअंदाज किये जाने के कारण बागी बने सांसद अपनी ही सरकार के निर्णय को गलत बताने पर तुले हुए हैं. जदयू के कई विधायक अफसरशाही के बढ़े हौसले के कारण अपनी ही सरकार से अन्दर ही अन्दर खफा चल रहे हैं.ऐसे विधायकों की संख्या 25 से अधिक है जो नयी राजनीति प्रारंभ करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, पर खुल नहीं रहे क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि अभी से स्थिति स्पष्ट करने पर उन्हें नुकसान हो सकता है. इसलिए वे चुप्पी साधे हुए हैं, पर विरोध में मुखर नेताओं को अपना मोरल सपोर्ट जरूर दे रहे हैं ताकि पार्टी नेतृत्व साइज में रहे.ऐसी बात नहीं है कि पार्टी को वैसे लोगों की गतिविधियों की खबर नहीं है पर दल के बड़े नेताओं का मानना है कि कुछ लोगों के विरोध का दल की सेहत पर कुछ भी असर नहीं पडऩे वाला.

दीदी आपको लालू से प्रॉब्लम है क्या ?

पटना : रेल मंत्री ममता बनर्जी और पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद के बीच विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. नया विवाद रेलवे के गोल्डेन पास को लेकर सामने आया है. ममता ने लालू प्रसाद यादव के उस पास को रद्द कर यह प्रमाणित कर दिया है कि वे अब लालू से व्यक्ति स्तर पर लडऩे पर उतारू हो गयी हैं. इससे लालू से ज्यादा ममता की अवाम में किरकिरी हुई है. अपना आजीवन रेलवे पास छिन जाने से दुखी पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव वर्तमान रेलमंत्री ममता बनर्जी पर जमकर बरसे. उन्होंने कहा कि यह गलत परंपरा की शुरूआत हो रही है जबकि सभी रेल मंत्रियों को रेलवे का गोल्डेन पास निर्गत किया जाता रहा है. रेल मंत्री को चार लोगों का पास मिलता है जबकि रेलवे के अधिकारी को दो व्यक्ति का गोल्डेन पास मिलता है. अब अधिकारी को भी दो व्यक्ति का पास मिले और मंत्री को भी उतना ही यह ठीक नहीं लगता. इस कारण उन्होंने रेल मंत्रियों को चार लोगों का पास निर्गत करने का निर्णय लिया. तो इसमें नया क्या हो गया है.
लालू प्रसाद यादव ने कहा कि किसी रेलमंत्री के द्वारा पास किया गया कोई भी प्रोजेक्ट या नियमों को अगले रेलमंत्री के द्वारा केंसिल किया जाना एक नयी परंपरा की शुरूआत है. यह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है. उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आज एक रेलवे अधिकारी को भी प्रथम श्रेणी का दो पास मिलता है और एक पूर्व रेलमंत्री को भी. इस लोकतंत्र में उतना हीं पास मिलेगा? यह उन्हें किसी दृष्टिकोण से सही नहीं लगा और उन्होंने उसे दो से चार लोगों का कर दिया. पास प्रकरण पर रामविलास पासवान ने कहा कि रेलवे का यह फैसला व्यक्तिगत लालू प्रसाद से जुड़ा हुआ नहीं है. इससे पूर्व सभी रेलमंत्रियों को वंचित होना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि जब वह रेलमंत्री थे तो दो पास दिया जाता था उसे लालू ने बढ़ाकर चार कर दिया था. इसका फायदा सभी पूर्व रेलमंत्रियों को मिला था. पुन: ममता ने इसे घटा कर दो कर दिया तो इसका भी घाटा सभी को होगा. व्यक्तिगत लालू प्रसाद का मामला यह नहीं है. सनद रहे कि रेलवे बोर्ड ने रेलमंत्री ममता बनर्जी के आदेश पर विगत दिनो उनका आजीवन कॉम्प्लीमेंट्री कार्ड पास वी-148 को निरस्त करते हुए उनका वीआईपी दर्जा समाप्त कर दिया था. अब वह सिर्फ सांसद सदस्यों वाली सुविधाओं के हकदार हो गये. इसके तहत उन्हें एसी प्रथम श्रेणी में पत्नी के साथ रिजर्वेशन मिलेगा. श्री यादव को अब मात्र राजधानी और शताब्दी के एसी प्रथम श्रेणी कोच में सिर्फ दो सीटों से काम चलाना होगा
गौरतलब है कि ममता बनर्जी के रेलमंत्री बनने के अगले दिन यानी 25 मई को 09 को लालू यादव ने रेलवे बोर्ड से अपने नाम लाइफ टाइम वीआईपी कॉम्प्लीमेंट्री कार्ड पास वी-148 जारी कराया था. साथ हीं उन्होंने उक्त सुविधा सभी पूर्व रेलमंत्री को भी देने का आदेश जारी कर रखा था लेकिन नई दिल्ली के वजाय पूर्व रेलवे मुख्यालय में बैठने वाली रेलवे मंत्री ममता बनर्जी से यह बात छिपी नहीं रह पाई और उन्होंने इस तरह से जारी पास को निरस्त करने का आदेश दे दिया. जिसके मद्देनजर रेल भवन ने इस पास को निरस्त कर दिया और उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय सहित देश के सभी जोनल मुख्यालयों को लालू के कॉम्प्लीमेंट्री पास बी-148 का दुरूपयोग रोकने की हिदायत दे दी है.

क्षत्रिय नेताओं के निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

पटना : महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के अवसर पर पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में एकत्र हुए राज्य भर के क्षत्रिय समाज के लोगों ने नयी राजनीति प्रारंभ करने का संकेत दिया है. क्षत्रिय समाज के सभी बड़े नेताओं के निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रहे. हैरत की बात तो यह है कि, कल तक जदयू का झंडा उठा कर सीना ताने चल रहे, पूर्व सांसद प्रभूनाथ सिंह ने, इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की और महाराणा प्रताप के चित्र को साक्षी रखकर नीतीश कुमार के खिलाफ झंडा उठाने का ऐलान कर दिया. वे नीतीश कुमार से तोल मोल के लिए उतारू हो गये हैं. इसके लिए उन्होंने नीतीश कुमार को दो माह का समय दिया है. उन्होंने पांच सवाल का जवाब उनसे मांगा है. जवाब सकारात्मक मिला तो ठीक है अन्यथा उन्होंने विरोध में झंडा उठा लेने की चेतावनी दे दी है. मजे की बात यह रही उस सभा में राज्य मंत्रिमंडल में शामिल खाद्य आपूर्ति मंत्री नरेन्द्र सिंह, एवं जदयू के कई विधायक भी मौजूद थे. इतना ही नहीं गत लोकसभा चुनाव में, निर्दलीय बाजी मारने वाले जदयू के बागी नेता दिग्विजय सिंह ने जनसभा को सम्बोधित कर जदयू से विक्षुब्ध चल रहे नेताओं के जख्मों को जम कर कुरेदा. परिणाम यह निकला कि उपस्थित भीड़ ने राज्य में नयी राजनीति प्रारंभ करने के वक्ताओं के संकेत को जोरदार नारा लगाकर हरी झंडी दिखा दी. समारोह की अध्यक्षता कर रहे जदयू के पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह ने तो राज्य सरकार को सौ में सिर्फ 22 अंक देकर विकास के इम्तेहान में भी फेल करार दे दिया. इतना ही नहीं आगामी परीक्षा यानी विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के पुन: सरकार में नहीं लौटने तक की भविष्यवाणी कर डाली. प्रभुनाथ सिंह ने, यह भी साफ कर दिया है कि, वे अभी पूरी तरह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने नहीं जा रहे. वे नीतीश कुमार से पांच सवाल करेंगे. चुनाव के समय जनता से किये गये वायदे के बारे में पूछेंगे. जिसमें कांट्रेक्ट पर हो रही बहाली, समाज को जात बिरादरी में बांटने और बटाइदारी बिल, बढ़ती अफसरशाही और गिरती विधि व्यवस्था पर उनसे स्थिति स्पष्टï करने को कहेंगे. क्योंकि गत विधानसभा चुनाव में जदयू ने जनता से वादा किया था, कि समरस समाज की स्थापना करेंगे. पर नीतीश कुमार अपने पूरे कार्यकाल में अब तक ऐसा नहीं कर पाये हैं. पिछड़ों में अति पिछड़ा और दलित में एक और तोड़ महादलित कर दिया गया. अब तक मुसलमान को एक माना जाता था. वहां भी पसमांदा का सोसा छोड़ मुसलमानों को बांटने का प्रयास किया गया. राज्य की उंची जातियों के बारे में, नीतीश कुमार की सोच का खुलासा करते हुए, अपने अभिभाषण में प्रभुनाथ सिंह ने कहा कि, जब वे राज्य की स्वर्ण जातियों के सरकार के कामकाज से नारजगी के बारे में कहने गये तो कहा गया स्वर्ण जातियों की नाराजगी से भाजपा निपटे. नीतीश कुमार के इस जवाब के बाद वे उनसे, अगड़ों के बारे में तो बात नहीं किये. तो क्या अब वे स्वर्ण जातियों की समस्या के बारे में भाजपा नेता नन्द किशोर यादव और सुशील कुमार मोदी से बात करने जायें. प्रभुनाथ सिंह ने, सभा में साफ कहा कि, नीतीश कुमार से, अपने पांच सवाल का जवाब वे अकेले मांगने नहीं जायेंगे. अन्य दलों के नेताओं को भी साथ में रखेंगे. तब उनसे स्थिति स्पष्टï करने को कहेंगे. संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो, गांधी मैदान में पंचायत लगाकर आगे की रणनीति तय करेंगे. इसका जवाब पंचायत में उपस्थित लोगों से ही मांगेंगे. लोग राजनीति छोड़ देने को कहेंगे तो उसी दिन से राजनीति छोड़ देंगे अन्यथा पूरे दम खम के साथ स्वाभिमान की रक्षा में जुट जायेंगे. इस प्रकार महाराणा प्रताप के नाम पर पटना में जुटी भीड़ ने जदयू में टूट को साफ कर दिया है. इससे जदयू की परेशानी बढ़ सकती है. क्योंकि गत चुनाव मे राजपूतों ने जमकर जदयू को समर्थन दिया था. दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, नरेन्द्र सिंह, आनन्द मोहन जैसे राजपूतों के जनाधार वाले नेताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी पर जब राज्य में सरकार बनी तो नीतीश कुमार ने जदयू सांसद दिग्विजय सिंह को बांका से टिकट नहीं दिया पर वे निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते. गत लोकसभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह को टिकट तो दिया गया पर नीतीश कुमार उनके चुनाव क्षेत्र में प्रचार करने नहीं गये. प्रभुनाथ सिंह के समथर्कों का मानना है कि नीतीश कुमार ने ऐसा जानबूझकर किया था. ताकि प्रभूनाथ सिंह संसद न पहुंच पायें. परिणामस्वरूप वे चुनाव हार गये. उधर जदयू विधायक आशा देवी का मानना है कि प्रभूनाथ सिंह, राज्यसभा जाने के लिए नीतीश कुमार पर दबाव बना रहे हैं. इस आरोप का खुलासा प्रभुनाथ सिंह ने अपने ही अंदाज में किया और साफ कर दिया कि वे जिस जाति व वंश में पैदा हुए हैं उसके संस्कार में कटोरा लेकर भीख मांगने की नहीं है. राजनीति करते हैं तो पद चाहिए ही. क्या नीतीश कुमार अपना पद उन्हें दे देंगे. वे स्वयं मुख्यमंत्री नहीं बने हैं. उन जैसे कई लोगों के अथक परिश्रम की वजह से वे आज मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं. चर्चा दो गोरवा पर भी हुई. कहा जा रहा है दो पांव वाले को बांध कर रखना बड़ा कठिन है. प्रभुनाथ सिंह नीतीश कुमार के उस बयान की व्याख्या कर रहे थे, जो उन्होंने कुछ दिनों पूर्व बन्दर, नील गाय और दो पांव वाले को बांधकर नहीं रखा जाने के संदर्भ में थी. प्रभूनाथ ने साफ किया कि नीतीश कुमार का बयान उनके लिये था. इस पर पलटवार करते हुए प्रभूनाथ ने नीतीश कुमार से पूछ डाला कि क्या जदयू में चार पांव वाले भी हैं? अगर ऐसा है तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की बजाये गौशाले का प्रबंधक होना चाहिए था. प्रभूनाथ पूरे जोश में थे. वे लालू प्रसाद के उस बयान को हकीकत का जामा पहनाने से भी नहीं चूके जिसमें नीतीश के पेट में दांत होने की बात कही गयी थी. बात राजनीतिक बेरोजगारी की भी निकली. प्रभुनाथ ने कहा कि नीतीश कुमार से बेहतर राजनीतिक बेरोजगारी को कौन समझ सकता है. जो 74 की लहर में भी हार गये थे. 80 में भी हारे और जब विकास पुरूष बने तब बाढ़ के संसदीय चुनाव में हारे. प्रभूनाथ, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का सेहरा अपने माथे पर बांधने से भी नहीं हिचके और साफ-साफ कह दिया कि फरवरी 2005 में चुनाव के बाद लोजपा को उन्होंने तोड़ा. लोजपा नहीं टूटता तो, नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बनने का सपना कभी पूरा नहीं होता. लोजपा के टूटने के बाद न्याय यात्रा हुई और फिर हुए चुनाव के बाद राजग की सरकार बनी. उनका मानना है कि महाराणा प्रताप ने जिस प्रकार अन्याय के खिलाफ आवाज उठायी और पराधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था ठीक उसी प्रकार अब समय आ गया है. चुनावी वर्ष है. जनता की पंचायत लगाकर स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी जायेगी.

बड़े और छोटे भाई से राज्य का विकास संभव नहीं

पटना : बड़े भाई और छोटे भाई से राज्य का विकास संभव नहीं है. बड़े भाई से मतलब लालू प्रसाद यादव और छोटे भाई यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. यह कहना है विधान पार्षद डा.शंभू शरण श्रीवास्तव का. इसीलिए अब वे मंझले भाई की भूमिका में राज्य को एक नयी क्षेत्रीय पार्टी से नवाजने जा रहे हैं. इसके लिए राज्य भर से ईमानदार व उपेक्षित कार्यकर्ताओं-नेताओं को एकजुट कर विधानसभा चुनाव के पूर्व नयी क्षेत्रीय पार्टी बनाने का मन बना चुके हैं और उसी नयी पार्टी के बूते राज्य के विकास की संभावनाओं को तलाशेंगे. उनका मानना है कि लालू प्रसाद यादव को हटा कर जदयू-भाजपा की राज्य में बनी सरकार से राज्य की जनता को विकास की काफी उम्मीद थी पर पिछले चार सालों में राज्य का जितना विकास होना चाहिए था नहीं हुआ. अब तो चुनावी साल आ गया. अब तक न तो कोई निवेशक राज्य में आये और न ही राज्य की विधि व्यवस्था में ही सुधार आया. इसीलिए उन्हें इस स्तर पर सोचना पड़ा है.उनका मानना है कि राज्य के मुख्यमंत्री विकास के नाम पर लोगों को अब तक ठगे हैं. अपराध से लेकर विकास तक की गणना की जाए तो सरकार पूरी तरह फेल रही है. नरेगा पर भी ठीक से काम नहीं हुआ है. गरीबों की संख्या राज्य में बढ़ी है. बिहार के शासक वर्ग द्वारा झूठे आंकड़े की बाजीगरी एवं प्रायोजित इनामों के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यही है कि विकास के हर पैमाने पर बिहार आज भी देश में सबसे निचले पायदान पर खड़ा है. नीतीश सरकार के चार सालों के बाद भी बिहार झारखंड से नीचे है. यह नतीजा उनका नहीं बल्कि देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों का है. बिहार की एक चौथाई आबादी रोजी रोटी एवं शिक्षा के अभाव में पलायन कर गयी है.पलायन घटने की बजाये बढ़ रहा है. बेरोजगारी भयावह रूप ले चुकी है.
कुपोषण महामारी की तरह मौजूद है. किसान एवं कृषि बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं. इन स्थितियों से हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है. राज्य का बड़ा हिस्सा नक्सलवाद की चपेट में है. थोड़े ठहराव के बाद अपराध पुन: फलने फुलने लगा है. बिहार के संदर्भ में विकास का प्रमुख लक्ष्य बड़े पैमाने पर रोजगार का निर्माण होना चाहिये. गरीबी दूर करने के लिए गरीबों को राजाओं की तरह दान देने की बजाय, उन्हें आर्थिक तौर पर सशक्त करने वाली नीतियां को लागू करना होगा. पर इसके लिए कृषि एवं किसानों की स्थिति में सुधार, महंगाई पर रोक लगाना, औद्योगीकरण, खास तौर पर कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास बुनकर एवं खादी ग्रामोद्योग पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी तथा परिवहन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करना होगा. इसके लिए बिजली की आवश्यकता होगी. बिजली के बिना विकास का दावा निरर्थक है. पर वर्तमान सरकार 4 सालों में एक मेगावाट भी अतिरिक्त बिजली का उत्पादन नहीं कर सकी है. उपरोक्त कामों को करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, भ्रष्टïाचारमुकत पारदर्शी प्रशासन तथा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक एवं निजी निवेश की आवश्यकता थी जिसमें सरकार विफल रही है. लाल फीताशाही के चंगुल से राज्य को मुक्त कराना होगा. पर सच्चाई यह है कि बिहार में बदलाव की तमाम सरकारी बयान बाजियों को निजी निवेशकों ने गंभीरता से नहीं लिया और राज्य में निजी निवेश नहीं के बराबर हुआ है. जहां तक सार्वजनिक या सरकारी निवेश का सवाल है, उसमें अभूतपूर्व लुट हो रही है. सरकारी तंत्र में उपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टïाचार बेलागाम कैंसर की तरह बढ़ रहा है. प्राथमिक शिक्षा का स्तर घटा है. उच्च शिक्षा का विस्तार एवं गुणवत्ता सपना बन कर ही रह गयी है. लाखों की संख्या में छात्र, छात्राएं राज्य से बाहर पढऩे जाने के लिये मजबूर है. स्वास्थ्य विभाग की घोषणायें भी डपोरशंखी साबित हुई हैं और बिहार के रोगियों को अभी तक इलाज के लिए भारी संख्या में राज्य से बाहर जाना पड़ रहा है. चार साल पहले लालू राज के अन्त के बाद जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो बिहार में बुनियादी तब्दीली की उम्मीद बंधी थी. पर अफसोस की बात है कि पलायन, गरीबी, बेरोजगारी आदि समस्याओं के समाधान के लिये कुछ करने की बजाय नीतीश कुमार का सत्ता प्रतिष्ठावन भी सत्ता भोग में लिप्त भ्रष्टïतंत्र का संरक्षक बन कर उभरे हंै. नीतीश राज को लालू राज से थोड़ा बेहतर होने की बात करने वाले भूल जाते हैं कि यह तर्क बिहार की चुनौतियों के सामने बेमतलब है. बिहार को देश का विकसित राज्य बनना है न कि लालू राज से दिखावटी तौर पर बेहतर. इन दो दशकों में कुछ महीनों को छोड़ कर इन दोनों भाईयों ने केंद्र या राज्य पर लगातार राज किया है. दो प्रमुख राष्टï्रीय राजनीतिक दलों ने इन दोनों का पिछलग्गु बन कर इनका समर्थन किया है. बिहार की दुर्गति के लिये क्या ये सभी, खास तौर पर दोनों भाई जिम्मेदार नहीं है?
बिहार को दिखावटी परिवर्तन या मेक-अप की आवश्यकता नहीं है. बिहार में नीतियों के स्तर पर प्रशासन के स्तर पर और राजनीति के स्तर पर बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है. इसके लिए एक वैकल्पिक राजनीति की आवश्यकता होगी. इस नयी राजनीति में युवकों की बड़ी भागीदारी की आवश्यकता है. समाज को जातियों में तोडऩे की बजाय जोडऩे की आवश्यकता है. अगर हम जात-पात से उपर नहीं उठे तो बिहार को कभी नहीं बदल पायेंगे और यथास्थितिवाद कायम रहेगा.इसलिए श्रीवास्तव जी का मानना है कि अब समय आ गया है जब राज्य में नयी राजनीति प्रारंभ हो इसके लिए विार मंथन प्रारंभ कर दिया गया है. जिसका परिणाम एक क्षेत्राीय दल के रूप में जल्द सामने आयेगा.