सोमवार, 25 जनवरी 2010

बड़े और छोटे भाई से राज्य का विकास संभव नहीं

पटना : बड़े भाई और छोटे भाई से राज्य का विकास संभव नहीं है. बड़े भाई से मतलब लालू प्रसाद यादव और छोटे भाई यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. यह कहना है विधान पार्षद डा.शंभू शरण श्रीवास्तव का. इसीलिए अब वे मंझले भाई की भूमिका में राज्य को एक नयी क्षेत्रीय पार्टी से नवाजने जा रहे हैं. इसके लिए राज्य भर से ईमानदार व उपेक्षित कार्यकर्ताओं-नेताओं को एकजुट कर विधानसभा चुनाव के पूर्व नयी क्षेत्रीय पार्टी बनाने का मन बना चुके हैं और उसी नयी पार्टी के बूते राज्य के विकास की संभावनाओं को तलाशेंगे. उनका मानना है कि लालू प्रसाद यादव को हटा कर जदयू-भाजपा की राज्य में बनी सरकार से राज्य की जनता को विकास की काफी उम्मीद थी पर पिछले चार सालों में राज्य का जितना विकास होना चाहिए था नहीं हुआ. अब तो चुनावी साल आ गया. अब तक न तो कोई निवेशक राज्य में आये और न ही राज्य की विधि व्यवस्था में ही सुधार आया. इसीलिए उन्हें इस स्तर पर सोचना पड़ा है.उनका मानना है कि राज्य के मुख्यमंत्री विकास के नाम पर लोगों को अब तक ठगे हैं. अपराध से लेकर विकास तक की गणना की जाए तो सरकार पूरी तरह फेल रही है. नरेगा पर भी ठीक से काम नहीं हुआ है. गरीबों की संख्या राज्य में बढ़ी है. बिहार के शासक वर्ग द्वारा झूठे आंकड़े की बाजीगरी एवं प्रायोजित इनामों के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यही है कि विकास के हर पैमाने पर बिहार आज भी देश में सबसे निचले पायदान पर खड़ा है. नीतीश सरकार के चार सालों के बाद भी बिहार झारखंड से नीचे है. यह नतीजा उनका नहीं बल्कि देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों का है. बिहार की एक चौथाई आबादी रोजी रोटी एवं शिक्षा के अभाव में पलायन कर गयी है.पलायन घटने की बजाये बढ़ रहा है. बेरोजगारी भयावह रूप ले चुकी है.
कुपोषण महामारी की तरह मौजूद है. किसान एवं कृषि बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं. इन स्थितियों से हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है. राज्य का बड़ा हिस्सा नक्सलवाद की चपेट में है. थोड़े ठहराव के बाद अपराध पुन: फलने फुलने लगा है. बिहार के संदर्भ में विकास का प्रमुख लक्ष्य बड़े पैमाने पर रोजगार का निर्माण होना चाहिये. गरीबी दूर करने के लिए गरीबों को राजाओं की तरह दान देने की बजाय, उन्हें आर्थिक तौर पर सशक्त करने वाली नीतियां को लागू करना होगा. पर इसके लिए कृषि एवं किसानों की स्थिति में सुधार, महंगाई पर रोक लगाना, औद्योगीकरण, खास तौर पर कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास बुनकर एवं खादी ग्रामोद्योग पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी तथा परिवहन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करना होगा. इसके लिए बिजली की आवश्यकता होगी. बिजली के बिना विकास का दावा निरर्थक है. पर वर्तमान सरकार 4 सालों में एक मेगावाट भी अतिरिक्त बिजली का उत्पादन नहीं कर सकी है. उपरोक्त कामों को करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, भ्रष्टïाचारमुकत पारदर्शी प्रशासन तथा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक एवं निजी निवेश की आवश्यकता थी जिसमें सरकार विफल रही है. लाल फीताशाही के चंगुल से राज्य को मुक्त कराना होगा. पर सच्चाई यह है कि बिहार में बदलाव की तमाम सरकारी बयान बाजियों को निजी निवेशकों ने गंभीरता से नहीं लिया और राज्य में निजी निवेश नहीं के बराबर हुआ है. जहां तक सार्वजनिक या सरकारी निवेश का सवाल है, उसमें अभूतपूर्व लुट हो रही है. सरकारी तंत्र में उपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टïाचार बेलागाम कैंसर की तरह बढ़ रहा है. प्राथमिक शिक्षा का स्तर घटा है. उच्च शिक्षा का विस्तार एवं गुणवत्ता सपना बन कर ही रह गयी है. लाखों की संख्या में छात्र, छात्राएं राज्य से बाहर पढऩे जाने के लिये मजबूर है. स्वास्थ्य विभाग की घोषणायें भी डपोरशंखी साबित हुई हैं और बिहार के रोगियों को अभी तक इलाज के लिए भारी संख्या में राज्य से बाहर जाना पड़ रहा है. चार साल पहले लालू राज के अन्त के बाद जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो बिहार में बुनियादी तब्दीली की उम्मीद बंधी थी. पर अफसोस की बात है कि पलायन, गरीबी, बेरोजगारी आदि समस्याओं के समाधान के लिये कुछ करने की बजाय नीतीश कुमार का सत्ता प्रतिष्ठावन भी सत्ता भोग में लिप्त भ्रष्टïतंत्र का संरक्षक बन कर उभरे हंै. नीतीश राज को लालू राज से थोड़ा बेहतर होने की बात करने वाले भूल जाते हैं कि यह तर्क बिहार की चुनौतियों के सामने बेमतलब है. बिहार को देश का विकसित राज्य बनना है न कि लालू राज से दिखावटी तौर पर बेहतर. इन दो दशकों में कुछ महीनों को छोड़ कर इन दोनों भाईयों ने केंद्र या राज्य पर लगातार राज किया है. दो प्रमुख राष्टï्रीय राजनीतिक दलों ने इन दोनों का पिछलग्गु बन कर इनका समर्थन किया है. बिहार की दुर्गति के लिये क्या ये सभी, खास तौर पर दोनों भाई जिम्मेदार नहीं है?
बिहार को दिखावटी परिवर्तन या मेक-अप की आवश्यकता नहीं है. बिहार में नीतियों के स्तर पर प्रशासन के स्तर पर और राजनीति के स्तर पर बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है. इसके लिए एक वैकल्पिक राजनीति की आवश्यकता होगी. इस नयी राजनीति में युवकों की बड़ी भागीदारी की आवश्यकता है. समाज को जातियों में तोडऩे की बजाय जोडऩे की आवश्यकता है. अगर हम जात-पात से उपर नहीं उठे तो बिहार को कभी नहीं बदल पायेंगे और यथास्थितिवाद कायम रहेगा.इसलिए श्रीवास्तव जी का मानना है कि अब समय आ गया है जब राज्य में नयी राजनीति प्रारंभ हो इसके लिए विार मंथन प्रारंभ कर दिया गया है. जिसका परिणाम एक क्षेत्राीय दल के रूप में जल्द सामने आयेगा.

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