सोमवार, 25 जनवरी 2010
क्षत्रिय नेताओं के निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
पटना : महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के अवसर पर पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में एकत्र हुए राज्य भर के क्षत्रिय समाज के लोगों ने नयी राजनीति प्रारंभ करने का संकेत दिया है. क्षत्रिय समाज के सभी बड़े नेताओं के निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रहे. हैरत की बात तो यह है कि, कल तक जदयू का झंडा उठा कर सीना ताने चल रहे, पूर्व सांसद प्रभूनाथ सिंह ने, इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की और महाराणा प्रताप के चित्र को साक्षी रखकर नीतीश कुमार के खिलाफ झंडा उठाने का ऐलान कर दिया. वे नीतीश कुमार से तोल मोल के लिए उतारू हो गये हैं. इसके लिए उन्होंने नीतीश कुमार को दो माह का समय दिया है. उन्होंने पांच सवाल का जवाब उनसे मांगा है. जवाब सकारात्मक मिला तो ठीक है अन्यथा उन्होंने विरोध में झंडा उठा लेने की चेतावनी दे दी है. मजे की बात यह रही उस सभा में राज्य मंत्रिमंडल में शामिल खाद्य आपूर्ति मंत्री नरेन्द्र सिंह, एवं जदयू के कई विधायक भी मौजूद थे. इतना ही नहीं गत लोकसभा चुनाव में, निर्दलीय बाजी मारने वाले जदयू के बागी नेता दिग्विजय सिंह ने जनसभा को सम्बोधित कर जदयू से विक्षुब्ध चल रहे नेताओं के जख्मों को जम कर कुरेदा. परिणाम यह निकला कि उपस्थित भीड़ ने राज्य में नयी राजनीति प्रारंभ करने के वक्ताओं के संकेत को जोरदार नारा लगाकर हरी झंडी दिखा दी. समारोह की अध्यक्षता कर रहे जदयू के पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह ने तो राज्य सरकार को सौ में सिर्फ 22 अंक देकर विकास के इम्तेहान में भी फेल करार दे दिया. इतना ही नहीं आगामी परीक्षा यानी विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के पुन: सरकार में नहीं लौटने तक की भविष्यवाणी कर डाली. प्रभुनाथ सिंह ने, यह भी साफ कर दिया है कि, वे अभी पूरी तरह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने नहीं जा रहे. वे नीतीश कुमार से पांच सवाल करेंगे. चुनाव के समय जनता से किये गये वायदे के बारे में पूछेंगे. जिसमें कांट्रेक्ट पर हो रही बहाली, समाज को जात बिरादरी में बांटने और बटाइदारी बिल, बढ़ती अफसरशाही और गिरती विधि व्यवस्था पर उनसे स्थिति स्पष्टï करने को कहेंगे. क्योंकि गत विधानसभा चुनाव में जदयू ने जनता से वादा किया था, कि समरस समाज की स्थापना करेंगे. पर नीतीश कुमार अपने पूरे कार्यकाल में अब तक ऐसा नहीं कर पाये हैं. पिछड़ों में अति पिछड़ा और दलित में एक और तोड़ महादलित कर दिया गया. अब तक मुसलमान को एक माना जाता था. वहां भी पसमांदा का सोसा छोड़ मुसलमानों को बांटने का प्रयास किया गया. राज्य की उंची जातियों के बारे में, नीतीश कुमार की सोच का खुलासा करते हुए, अपने अभिभाषण में प्रभुनाथ सिंह ने कहा कि, जब वे राज्य की स्वर्ण जातियों के सरकार के कामकाज से नारजगी के बारे में कहने गये तो कहा गया स्वर्ण जातियों की नाराजगी से भाजपा निपटे. नीतीश कुमार के इस जवाब के बाद वे उनसे, अगड़ों के बारे में तो बात नहीं किये. तो क्या अब वे स्वर्ण जातियों की समस्या के बारे में भाजपा नेता नन्द किशोर यादव और सुशील कुमार मोदी से बात करने जायें. प्रभुनाथ सिंह ने, सभा में साफ कहा कि, नीतीश कुमार से, अपने पांच सवाल का जवाब वे अकेले मांगने नहीं जायेंगे. अन्य दलों के नेताओं को भी साथ में रखेंगे. तब उनसे स्थिति स्पष्टï करने को कहेंगे. संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो, गांधी मैदान में पंचायत लगाकर आगे की रणनीति तय करेंगे. इसका जवाब पंचायत में उपस्थित लोगों से ही मांगेंगे. लोग राजनीति छोड़ देने को कहेंगे तो उसी दिन से राजनीति छोड़ देंगे अन्यथा पूरे दम खम के साथ स्वाभिमान की रक्षा में जुट जायेंगे. इस प्रकार महाराणा प्रताप के नाम पर पटना में जुटी भीड़ ने जदयू में टूट को साफ कर दिया है. इससे जदयू की परेशानी बढ़ सकती है. क्योंकि गत चुनाव मे राजपूतों ने जमकर जदयू को समर्थन दिया था. दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, नरेन्द्र सिंह, आनन्द मोहन जैसे राजपूतों के जनाधार वाले नेताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी पर जब राज्य में सरकार बनी तो नीतीश कुमार ने जदयू सांसद दिग्विजय सिंह को बांका से टिकट नहीं दिया पर वे निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते. गत लोकसभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह को टिकट तो दिया गया पर नीतीश कुमार उनके चुनाव क्षेत्र में प्रचार करने नहीं गये. प्रभुनाथ सिंह के समथर्कों का मानना है कि नीतीश कुमार ने ऐसा जानबूझकर किया था. ताकि प्रभूनाथ सिंह संसद न पहुंच पायें. परिणामस्वरूप वे चुनाव हार गये. उधर जदयू विधायक आशा देवी का मानना है कि प्रभूनाथ सिंह, राज्यसभा जाने के लिए नीतीश कुमार पर दबाव बना रहे हैं. इस आरोप का खुलासा प्रभुनाथ सिंह ने अपने ही अंदाज में किया और साफ कर दिया कि वे जिस जाति व वंश में पैदा हुए हैं उसके संस्कार में कटोरा लेकर भीख मांगने की नहीं है. राजनीति करते हैं तो पद चाहिए ही. क्या नीतीश कुमार अपना पद उन्हें दे देंगे. वे स्वयं मुख्यमंत्री नहीं बने हैं. उन जैसे कई लोगों के अथक परिश्रम की वजह से वे आज मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं. चर्चा दो गोरवा पर भी हुई. कहा जा रहा है दो पांव वाले को बांध कर रखना बड़ा कठिन है. प्रभुनाथ सिंह नीतीश कुमार के उस बयान की व्याख्या कर रहे थे, जो उन्होंने कुछ दिनों पूर्व बन्दर, नील गाय और दो पांव वाले को बांधकर नहीं रखा जाने के संदर्भ में थी. प्रभूनाथ ने साफ किया कि नीतीश कुमार का बयान उनके लिये था. इस पर पलटवार करते हुए प्रभूनाथ ने नीतीश कुमार से पूछ डाला कि क्या जदयू में चार पांव वाले भी हैं? अगर ऐसा है तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की बजाये गौशाले का प्रबंधक होना चाहिए था. प्रभूनाथ पूरे जोश में थे. वे लालू प्रसाद के उस बयान को हकीकत का जामा पहनाने से भी नहीं चूके जिसमें नीतीश के पेट में दांत होने की बात कही गयी थी. बात राजनीतिक बेरोजगारी की भी निकली. प्रभुनाथ ने कहा कि नीतीश कुमार से बेहतर राजनीतिक बेरोजगारी को कौन समझ सकता है. जो 74 की लहर में भी हार गये थे. 80 में भी हारे और जब विकास पुरूष बने तब बाढ़ के संसदीय चुनाव में हारे. प्रभूनाथ, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का सेहरा अपने माथे पर बांधने से भी नहीं हिचके और साफ-साफ कह दिया कि फरवरी 2005 में चुनाव के बाद लोजपा को उन्होंने तोड़ा. लोजपा नहीं टूटता तो, नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बनने का सपना कभी पूरा नहीं होता. लोजपा के टूटने के बाद न्याय यात्रा हुई और फिर हुए चुनाव के बाद राजग की सरकार बनी. उनका मानना है कि महाराणा प्रताप ने जिस प्रकार अन्याय के खिलाफ आवाज उठायी और पराधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था ठीक उसी प्रकार अब समय आ गया है. चुनावी वर्ष है. जनता की पंचायत लगाकर स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी जायेगी.
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