सोमवार, 25 जनवरी 2010

जद यू का विवाद बढ़ा

पटना : पांचवें साल में प्रवेश करते ही सत्ताधारी दल राजग में यह क्या हो रहा है? अमूमन यह देखा जाता है कि नेता चुनावी साल में सरकार की उपलब्धियों से आमजन को रूबरू कराने में जुट जाते हैं पर यहां तो मामला पूरी तरह उलटा दिखायी दे रहा है. जदयू के नेता आपस में लडऩे लग गये हैं. विपक्षी दलों पर प्रहार करने की बजाय खुद अपने ही दल की खामियों को सरेआम करने में जुटे हैं. इनमें कई बड़े नेता शामिल हैं. जो पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रहे है.ं उनका मानना है कि दल ने जब उनकी चिन्ता छोड़ दी तो वे पार्टी की जड़ें क्यों नहीं कुरेदें? माल महाराज का और मिरजा खेले होली यह ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है.19 जनवरी को प्रभूनाथ सिंह ने नीतीश कुमार के खिलाफ पटना में जमकर अपनी भड़ास निकाली. यह तो झांकी है. जदयू के कई सांसदों के बारे में कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस के टच में हैं. उन्हें इंतजार बस पर्याप्त संख्या और डील के पूरा होने का है. भाजपा नेता राणा ऋषिदेव अलग खफ चल रहे हैं. जदयू के एक राज्यसभा सदस्य अपनी पार्टी से खफा चल रहे हैं. यह जदयू के साथ क्या हो रहा. खुद जदयू से जुड़े नेताओं को समझ में नहीं आ रहा कि कैसे इन नेताओं के गुस्से को विराम दिया जाए. अब तो जदयू के नेता ही सरकार और मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर उंगली उठाने लगे हैं. उधर जदयू से निष्कासित उपेंद्र कुशवाहा और रामबिहारी सिंह को जदयू में फिर वापस लाने के निर्णय से पहले उनसे सलाह तक नहीं किये जाने के कारण नाराज प्रदेश जदयू अध्यक्ष की नाराजगी अब सतह पर आ गयी है. जिसका इजहार वे खास बैठकी में खुलेआम कर रहे हैं. वे भी सही समय का इंतजार कर रहे हैं. उनके खफा होने की एक वजह और भी है. वह यह कि उनके एक स्वजातीय नेता को फिर से दल में वापस लाने की कवायद तेज कर दी गयी है जो अभी कांग्रेस में हैं. गत लोकसभा चुनाव वे कांग्रेस की टिकट पर लड़े थे. परिवारवाद को रोकने के प्रयास के कारण गत लोकसभा चुनाव में सांसद की राय को नजरअंदाज किये जाने के कारण बागी बने सांसद अपनी ही सरकार के निर्णय को गलत बताने पर तुले हुए हैं. जदयू के कई विधायक अफसरशाही के बढ़े हौसले के कारण अपनी ही सरकार से अन्दर ही अन्दर खफा चल रहे हैं.ऐसे विधायकों की संख्या 25 से अधिक है जो नयी राजनीति प्रारंभ करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, पर खुल नहीं रहे क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि अभी से स्थिति स्पष्ट करने पर उन्हें नुकसान हो सकता है. इसलिए वे चुप्पी साधे हुए हैं, पर विरोध में मुखर नेताओं को अपना मोरल सपोर्ट जरूर दे रहे हैं ताकि पार्टी नेतृत्व साइज में रहे.ऐसी बात नहीं है कि पार्टी को वैसे लोगों की गतिविधियों की खबर नहीं है पर दल के बड़े नेताओं का मानना है कि कुछ लोगों के विरोध का दल की सेहत पर कुछ भी असर नहीं पडऩे वाला.

1 टिप्पणी:

  1. सुशासन बाबु के पेट में भी दांत है. लालू तो खाली बोलईते रहन, सुशासन बाबु त बहुत उपाय कर ताड़न.

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